Friday, April 29, 2022

परिवर्तन योगेश संस्थान की ओर से युवा संस्कार उपाधि अलंकरण 2022

 

चन्दौली ब्यूरो / डीडीयू नगर, उत्तर प्रदेश पत्रकार परिषद द्वारा पूर्वांचल रत्न अलंकरण सम्मान समारोह 2022 का भव्य आयोजन नगर के केसरी नंदन उत्सव वाटिका में किया गया। सर्वप्रथम इस कार्यक्रम के द्वव मुख्य अतिथि श्री प्रेम प्रकाश मीणा (आईएएस), ज्वॉइंट मजिस्ट्रेट चकिया, श्रीमती राम्या आर (आईएएस), ज्वॉइंट मजिस्ट्रेट चन्दौली,  व द्वव् विशिष्ठ अतिथि श्री आशीष मिश्रा, बरिष्ठ मंडल सुरक्षा आयुक्त, पूर्व मध्य रेलवे डीडीयू मंडल, एवं श्री दिनेश चंद्र, वरिष्ठ राज भाषा अधिकारी पूर्व मध्य रेलवे डीडीयू मंडल व्दारा  कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ ज्ञान की देवी मां सरस्वती के तैल चित्र पर माल्यार्पण कर उनके समक्ष दीप प्रज्वलित कर किया गया,

तत्पश्चात् अतिथियों का स्वागत उत्तर प्रदेश पत्रकार परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेश मिश्रा ने अंग वस्त्र, सम्मान पत्र, और स्मृति चिन्ह देकर किया। उसके बाद केन्द्रीय विद्यालय डीडीयू की छात्रा दिव्यांशी शर्मा ने अतिथियों के सम्मुख जै जै हो महिषासुर मर्दिनी गीत पर नृत्य प्रस्तुत किया। साथ ही विक्की तिवारी"छोटा पागल"  गीत,गज़ल,और भजन की प्रस्तुति कर कार्यक्रम में चार चांद लगा दिया।

उक्त कार्यक्रम में चन्दौली समाचार एक्सप्रेस द्वारा कुमारी ममता,अमृता ,अलका मिश्रा, नेहा सिद्दीकी,शम्बुल ऐसा,सोमा शेरू,उत्कर्षिणी,दिव्यांशी शर्मा, खुशी सिंह, दिव्यांशी उपाध्याय, तान्या गुप्ता, खुशी जायसवाल, बीना मिश्रा शक्ति श्री महिला सम्मान देकर सम्मानित किया गया।
उत्तर प्रदेश पत्रकार परिषद पत्रकारों के हित में पिछले 16वर्षों से लगातार कार्य कर रही है उसी कड़ी में जनपद चन्दौली के वरिष्ठ पत्रकार एवं ब्यूरो चीफ बृजेश कुमार जी  को अंग वस्त्र और स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।साथ ही न्यास के अधिनियम 4के अंर्तगत समाज में अपना अनुकरणीय योगदान देने वाले महान विभूतियों को परिषद् द्वारा सम्मानित किया जाता है, स्थानीय, जनपदीय, गैर जनपदीय कुल 27 लोगो को परिषद् द्वारा पूर्वांचल रत्न अलंकरण सम्मान 2022से सम्मानित किया गया जो क्रमश है, स्टूडेंट पब्लिक स्कूल शिक्षा सेवा, विक्की तिवारी "छोटा पागल" संगीत सेवा,डॉ राघवेंद्र नारायण सिंह साहित्य सेवा, शिवकुमार शिक्षा सेवा, सूर्य प्रकाश सिंह शिक्षा और पत्रकारिता,केसरी फूड प्लाजा रेस्टोरेंट्स एंड लॉन, रामजन्म चंचल लोक संगीत, विनोद यादव समाज सेवा, निशा सिंह व डा.राज पांडे शिक्षा सेवा, मानव खिदमत फाउंडेशन समाज सेवा, सचिन कुमार सिंह शिक्षा सेवा, डॉक्टर संतोष कुमार सिंह वरिष्ठ वैज्ञानिक मेडिकल साइंस काशी हिंदू विश्वविद्यालय, रोहित यादव खेल सेवा, कुलदीप मौर्य समाज सेवा, दीपक दुबे समाज सेवा, पब्लिक इंटरेस्ट थिंकर एसोसिएशन समाज सेवा, साथ ही कोविड-19 में अपना विशेष योगदान देने वाले प्राथमिकता के आधार पर डॉक्टर अनूमा दयाल, डा.आर के शर्मा, डा.चंदन जायसवाल, डा.आशुतोष कुमार सिंह, डा.मृत्युंजय दुबे, डा.राहुल सिंह डॉक्टर ए के सिंह, ओम नेत्रालय एवं पाली क्लीनिक, रिया पॉली क्लिनिक हॉस्पिटल एंड सर्जिकल सेंटर, एस. एस.हॉस्पिटल एंड सर्जिकल ट्रामा सेंटर को चिकित्सा सेवा में कुल 27 लोगो को *पूर्वांचल रत्न अलंकरण सम्मान देकर सम्मानित किया गया।

नगर के होनहार युवा अविनाश लखन को दिल्ली की संस्था परिवर्तन योगेश के माध्यम से "युवा नेतृत्व सम्मान 2022" एक विशेष सम्मान से सम्मानित किया गया। सम्मान देने के पश्चात अपने उद्बोधन में प्रेम प्रकाश मीणा ने कहा कि सम्मान व्यक्ति को और भी बेहतर करने की प्रेरणा देता है। अनुकरणीय कार्य करने वाले लोगों का इस प्रकार सम्मान होता रहना चाहिए जिससे समाज में स्वस्थ वातावरण बनता है। राम्या आर ने कहा कि महिलायो की समाज व परिवार में विशेष भूमिका होती। जिस समाज की महिलाएं अपनी जिम्मेदारियों को समझकर विशिष्ट योगदान करती हैं उनका सदैव सम्मान किया जाना चाहिए।

अवसर पर दिनेश चंद्र जी व आशीष मिश्रा जी ने भी अपने विचार रखे और सभी सम्मानित हुए लोगों को शुभकामनाएं दीं।
संस्था का परिचय जिलाध्यक्ष संजय शर्मा, अतिथियो का स्वागत मनोज कुमार पाठक (जिला महामंत्री चन्दौली) कार्यक्रम का संचालन सुरेश कुमार "अकेला" और धन्यवाद ज्ञापन राजेश मिश्रा राष्ट्रीय अध्यक्ष उत्तर प्रदेश पत्रकार परिषद द्वारा किया गया।
उक्त कार्यक्रम में मनोज कुमार शर्मा, विजय कुमार, अजय कुमार अकेला, सचिन, डा. जय शंकर चौबे, डा.मुन्ना खान,डा. शिव कुमार यादव, उमेश दुबे, तलवार सिंह, चंद्र भूषण मिश्रा "कौशिक" ,आजाद सिंह, तलवार सिंह,आरपीएफ इंस्पेक्टर संजीव कुमार, शाकिर अंसारी, अशोक जायसवाल,आरपीएफ इंस्पेक्टर रंजीत कुमार, संतोष सिंह ,इंद्र कुमार, तेज प्रकाश मलिक, विकास शर्मा, लाल बहादुर, नन्दजी, प्रदीप पहलवान, ईश्वर पहलवान और नगर के तमाम वरिष्ठ गण कार्यक्रम में उपस्थित रहे।

Wednesday, September 29, 2021

अपाहिज बूढ़े मेज़र जनरल का हश्र


 चलने फिरने में असमर्थ रिटायर्ड मेजर जनरल का घर के एक कमरे में फर्श पर गद्दा लगा दिया गया और नौकर को कहा कि इनका पूरा ख्याल रखना, हमें कोई शिकायत ना मिले। बेटों की नई शादियां हुई थी। एक ने गर्मी की छुट्टियां गुजारने फ्रांस का प्रोग्राम बनाया और दूसरे ने लंदन का, और तीसरे ने पेरिस का। हर जगह अपना परिचय मेजर जनरल के बेटे होने से शुरु करते ... नौकर को चेतावनी दी, हमारी तीन माह के बाद वापसी होगी। तुम बाबा का पूरा ख्याल रखना, वक्त पर खाना देना। नौकर-अच्छा साहब जी ! सब चले गए वह बाप अकेला घर के कमरे में लेटा सांस लेता रहा, ना चल सकता था, ना खुद से कुछ मांग सकता था। नौकर घर को ताला लगाकर बाजार से ब्रेड लेने गया तो उसका एक्सीडेंट हो गया। लोगों ने उसे हॉस्पिटल पहुंचाया और वह कोमा में चला गया। नौकर कोमा से होश में ना आ सका। बेटों ने नौकर को सिर्फ बाप के कमरे की चाबी देकर बाकी सारे घर को ताले लगाकर चाबियां साथ ले गए थे। नौकर उस कमरे को ताला लगाकर चाबी साथ लेकर गया था कि अभी वापस आ जाऊंगा। अब बूढ़ा रिटायर्ड मेजर जनरल कमरे में बन्द हो चुका था,वह चल फिर भी नहीं सकता था, किसी को आवाज नहीं दे सकता था। यहां  3 माह बाद जब बेटे वापस आए और ताला तोड़कर कमरा खोला गया तो लाश की हालत वह हो चुकी थी जो तस्वीर में दिखाई दे रही है।


यह घटना हमें बता रही है कि किस तरह अपनी संतान के लिए नेकी और बुराई की परवाह किए बगैर माता-पिता उनका भविष्य संभालने के लिए तन,मन,धन खपाते हैं और ज्यादा से ज्यादा दौलत-जायदादें बनाकर उनका भविष्य की पीढ़ियों को आर्थिक रूप से सुदृढ़ करने की कोशिश करते हैं और सोचते हैं कि यह औलाद कल बुढ़ापे में मेरी देखभाल करेगी। *बेहतरीन स्कूलों में भौतिक शिक्षा दिलवाने की आपाधापी में हम ये भूल जाते हैं कि जीवन उपयोगी नैतिक मूल्यों, मानवतायुक्त संस्कारों, धार्मिक विचारों की शिक्षा देने से ही मानव का पूर्ण विकास संभव होता है। नैतिक, सामाजिक, धार्मिक मानविकी शिक्षा को हम समय की बर्बादी समझते हैं।हर इंसान जो बोता है उसी का ही फल पाता है।हमें भी सोचने-समझने की जरूरत है।कि हम अपनी औलाद को क्या सही शिक्षा दिलवा रहे हैं। कहीं हमारा हाल भी ऐसा तो नहीं होने वाला है।सोचिए जरूर ईश्वर आपको यह दिन न दिखाएं।

Sunday, June 6, 2021

सच को सच कहने दो, सच को सच रहने दो


 देश में बहुतायत विचार हैं पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS)के खिलाफ इतनी मुखर विरोध की परिपाटी भारत में आखिर क्यों ?
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भारत सनातन विचार संस्कार संस्कृति का देश रहा लुटेरों ने इसे ना-ना प्रकार के तौर तरीकों ना -ना प्रकार के भेष भूषा में आकर ,रहकर लुटा ।
हमारी उदार समझ संस्कृति व्यवहार में उनका आकर्षण इतना रहा की वो लूट के बावजूद भी भारत से जा न सके । भारत के हर चीज में वो मोह फास में फसे ही रहे वो धन ,वैभव हो ,भौगोलिक वातावरण हो, प्राकृतिक परिवेश हो, ऐतिहासिक धरोहर हो, या यहा के जनमानस की सहजता उदारता और संस्कार संस्कृति --------
कुछ लोगों ने हमें मिटाने का प्रयास किया तो कुछ नें हमें उलझाने का . कुछ छलने का तो कुछ नें हमारे जैसा बनने का भी प्रयास किया ।
हम भारतीय समझतें भी रहे और उलझते भी रहे और उसमें से कुछ अपने मौलिक अस्तित्व को बचाने के लिए  यथासंभव लड़ते भी रहे पर  यह क्रम इतना लंबा चला की भारत लुटेरों को भी अतिथि समझने लगा और अपने संस्कार संस्कृति के मोह फास में पड़ उन्हें 'आतिथि देवों भव" के भाव से देखने लगा ।
 कहावत हैं चोर लुटेरे सब कुछ छोड़ दे तब भी वो हेरा फेरी नहीं छोड़ता और यही हुआ ।  भारत की उदार शान्तिप्रिय जनता लुटे गये भारतीय संसाधनों पर बैठे लुटेरों को भी राजा मानने लगी और खुद को उनका प्रजा ----
यह सब चाल चलन देख लुटेरे भी भावुक हो गए और मेरा भी ,मेरा भी का झूठ बोलने लगे और हम सब ठहरे अति उदार हम भी उनके स्वर में स्वर मिला कहने लगे ---
क्यों नहीं ,क्यों नहीं -------
फिर क्या था लुटेरे भी अपने दिखने लगे ।
           पर आंतरिक सचं तो हैं लुटेरों का कभी अपना विचार नहीं बदला
बस उनकी मजबूरी ये जरूर हो गईं की वो स्वीकार लिए की इतना बफादार जनसमाज और आस्थावान गुलाम और कही नहीं मिल सकता  ---- फिर हिस्से हिस्सेदारी धर्म की साझेदारी की खेती भारत के खेतों में भारतीय जन बल के श्रम व कार्य कौशल से शुरू हो गईं और देश के संस्कार संस्कृति अध्यात्म ज्ञान विज्ञान का बंदर बाट उनके बीच शुरू हो गया । जो कल लुटेरे थे वो आज भी लुटेरें हैं बस बदलाव हैं तो वो हैं कल वो लुटेरों के शक्ल में थे और आज हम शक्ल हो गए हैं ।
■------------लुटेरें चाहे कितने भी हम शक्ल हो  हम वतन
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हो उन्हें सह हिस्सेदार मानना ही गलत शायद यह विचार
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 रखने के कारण ही  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विरोध
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 करने का चलन बन गया  --------------
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आरएसएस बनांम अन्य •••••••••
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●आरएसएस जो कहती हैं करती हैं दीखती हैं सोचती हैं समझती और  होती हैं   ---
★पर हमारे विरोधी  ---कहते  कुछ हैं, सोचते कुछ हैं, होते कुछ हैं, दिखते कुछ हैं-- और चाहते कुछ हैं ---
●हम जहा सत्य को बचाना चाहते हैं ।
★वो झूठ को सजाना चाहते हैं ।
●हम अपनी संस्कार संस्कृति के छांव में रहना चाहते हैं ।
★वो बदलाव की आड़ में हमें हमारी अच्छाइयों से दूर कर देना चाहते हैं ।
●हमारा इतिहास आस्था विश्वास व चरित्र प्रधान हैं ।
★वो हमारे आस्था व विश्वास के खिलाफ चरित्रहीनता को आदर्श बताना चाहते हैं
●हम इस देवभूमि के उत्तराधिकारी हैं यह भूलना नहीं चाहते ।
★वो देवभूमि के लुटेरें इस आस्था से जुड़ना नहीं चाहते क्यों की उन्हें डर हैं की उनका लूट झूठ जगजाहिर होगा ।
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हम सिर्फ असहमत नहीं ---
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कुरीतियों को मिटाने नये नये आयाम को बढ़ाने का हम सब के  पास भी विकल्प खुला हैं  यह प्रमाणित करता हुआ  हमारे पास भूत, वर्तमान व लचर व उदार  भविष्य  हैं पर इसके बावजूद हमारा एक  हठ हैं
----सच को सचं रहने दो , सचं को सचं कहने दो ।
---------------------चन्द्र भूषण मिश्र "कौशिक"
                        संरक्षक /परिवर्तन योगेश परिवार

Saturday, February 20, 2021

"मोदी सरकार से लगाव-----मध्यम वर्ग का भाग्य या दुर्भाग्य

 जो मध्यमवर्ग राष्ट्र और राष्ट्रवादी पथ पर चलने को सबसे ज्यादा जज्बा रखता हैं वही राष्ट्रवादी सरकार के चाभुक से आज सबसे ज्यादा पीटा जा रहा ----
               क्या प्रधानमंत्री मोदी जी मध्यम वर्ग को अपने विकास मॉडल के तस्वीर में जबरनिया आगे बढ़ा देना चाहते हैं या फिर मध्यमवर्ग की कैटगरी को  समाप्त ही कर देना चाहते हैं यह सवाल अब मध्यम वर्ग को सताने लगा हैं ?
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ऐसी स्थिति परिस्थिति में दो ही विकल्प होते हैं ---------
■  एक में मध्यमवर्ग आगे बढ़ जाये ।
■तो दूसरे में मध्यमवर्ग अति निम्न की दिशा में चला जाये
और मध्यम वर्ग का विकल्प ही समाप्त हो जाये ।
                       मैं यह तो नहीं कह सकता कि मोदी जी की कार्य प्रणाली में मध्यम वर्ग  विल्कुल सहभागी ही नहीं पर मैं यह भी नहीं मान सकता कि मध्यम वर्ग सिर्फ सरकार सहयोगी व उनका अनुकरण करने वाली चरित्र की ही हो ।
♀अभी तक सरकार के द्वारा किये गए बड़े फैसले में मध्यम वर्ग ही तो सबसे ज्यादा #प्रभावितऔरप्रभावी हुआ हैं यह तो सरकार को समझना और मानना ही होगा ।
क्यों की वर्तमान सरकार को बनाने और वर्तमान  सरकार को बढ़ाने में मध्यम वर्ग की भूमिका सरकार अगर नजरअंदाज करती हैं तो जनविश्वास के साथ यह एक बड़ा विश्वासघात सा होगा ऐसा मुझे लगता हैं ।
धनवान वर्ग और कारपोरेट वर्ग तो सत्ता के साथ हर समय गलबहियां बनाकर चलता ही रहा हैं इसमें कोई नई बात तो नहीं ----बस पहले और आज में बस एक ही फर्क हैं कि पहले ओधोगिक घराने राजनैतिक घरानों को सीधा लाभ पहुंचाते थे ।
पर अब वर्तमान सरकार में व्यक्तिगत कम दलगत ज्यादा सहयोग का चलन-प्रचलन में हो गया हैं ।
● अब सवाल हैं कि क्या मोदी सरकार सिर्फ चौकाने वाले फैसले और बदलाव से ही मध्यमवर्ग को साधने के भ्रम से भ्रामित हैं ?
••••••••••••••••तो ऐसे में कहूँ तो यह सच हैं कि निम्नवर्ग रोटी ,कपड़ा ,मकान और छोटी छोटी अपनी आवश्यकताओं पर सरकारी कृपा पात्रता पाकर खुश हो जाती हैं कुछ छोटी मोटी आर्थिक ,सामाजिक,जातिगत सहयोग पर अपना मताधिकार दान दे या बेच देती हैं जब की धनवान अपने धनबल से सरकार का चहेता बन उसके करीब आ जाता हैं लेकिन ये दोनों वर्ग राष्ट्र निर्माण के दायित्व ले चलने का जबाबदेही का कोई संकल्प पत्र नहीं भरते कोई स्थायी जिम्मेदारी नहीं लेते ।
सिर्फ अवसर और अवसरवादिता को जीते  हैं और उसी के हित में चलने की  पसंद पर विश्वास करते हैं ।
जब की मध्यम वर्ग समाज निर्माण से लेकर राष्ट्रवाद तक का सबसे सक्रिय सहयात्री बन राष्ट्र समाज और सरकार के हित में सबसे ज्यादा काम आते हैं ।
---------जाने अनजाने में जाने क्यों सरकार मध्यमवर्ग की जरूरतों उनकी आकांक्षाओं उनकी मांगों को नजरअंदाज कर रही या कहे मध्यमवर्ग को हताश व निराश कर रहीं !
◆◆◆कुछ एक घुन पड़ जाने से गेहूं अनुपयोगी नहीं होता इतनी समझ तो सरकार को होनी ही चाहिए यह आशा अभिलाषा मध्यमवर्ग की सरकार से हैं इसे सरकार को संज्ञान में रखना चाहिए ।
मध्य तंत्र  के बिना प्रारम्भ या अंत की परिकल्पना के एक मिथ्या नीति हैं ।
यह कहना चाहता हैं!--- मोदी सरकार से मध्यमवर्ग और यही सुनना आज देश की जरुरत भी हैं ---
क्यों की प्राथमिक चिकित्सा व तैयारी के बिना बड़ी सर्जरी सरकार के साथ साथ किसी और के जान जोखिम में डालने वाली समझ की कारण बन सकती हैं ।
यह हैं आज मध्यमवर्ग की गुहार ।।
-------------चन्द्र भूषण मिश्र "कौशिक"


Monday, February 1, 2021

बिना पढ़ाई फीस उगाही अब और नहीं अब और नहीं

 ■नो स्कूल नो फीस का नारा लगाना या बिना पढ़ाई फीस उगाही अब और नहीं अब और नहीं ।--- कहना कोई अपराध तो हैं नहीं ।
 जिन संसाधनों का हमने या हमारे लोगों ने उपभोग किया ही नहीं आखिर उसका कोई भुगतान क्यों करें ?हर शिक्षा संस्था सेवा धर्मी हैं यह बिना व्यवहार के मानने को किसी को बाध्य करना गलत हैं । इस लिए उसकी हर मांग जायज हैं यह तुगलकी फरमान का क्या मतलब ?
 ऐसे ही कुछ सवाल आज निजी स्कूल प्रबंधकों और अभिभावकों को आमने सामने ला खड़ा कर दिये  हैं ।
            बिना काम के दाम भारतीय  संस्कार में वसूलने की प्रथा तो कहीं नहीं हैं । शायद  अंग्रेज और अंग्रेजियत की चाल चलन का यह असर हैं  कि अभी भी  अंग्रेजी लगान की तरह  भारत के सविधान के आँख में धूल झोंक कर स्कूल शिक्षा कह कर मनमांनी वसूली सिर्फ शिक्षा सेवा के नाम पर देश में जारी हैं । वो भी कोरोना महामारी के अंतरराष्ट्रीय स्थिति परिस्थित काल के समय में  ।
आखिर  यह कहने में संकोच कैसा की भारत के आंग्रेजियत व कान्वेंट समझ के निजी  शिक्षा संस्थान के पालनहारो में उनके  आचार विचार में निज् स्वार्थ की सिद्धि और अपनी अंग्रेजियत का दबदबा बना सेवा का चोला ओढ़ समाज में  समाजसेवी बन खूब धन उगाही के सिवाय कोई और समझ आज की निजी स्कूलों सोच में नहीं हैं । यह कोरोना आपदा  में बंद पड़े स्कूल और उनके द्वारा अभिभावकों से मांगे जा रहे फीस को देख कोई भी  समझ  सकता हैं ।
जिस  प्रकार सिथिल पड़े अंगों में शून्यता आ जाती हैं उसी तरह शिक्षा के नाम पर अभिभावक विश्वासप्रद शिथिलता में थे और इसी शिथिलता की आड़ में शिक्षा जैसी मौलिक जरुरत को भी  स्वार्थ के  हवाले कर सरकारे सरकारी तंत्रों की शिक्षा के प्राण हरण  कर निजी स्कूली शिक्षा को सबल दिखाने की भूल या छल करने लगे । जिसके कारण शिक्षा सेवा की आड़ में सामन्ती व्यवहार का फलना फूलना सरकारी निगरानी में जारी हो गया  ।
#प्रस्तुत हैं जितनी पढ़ाई उतना ही फीस आंदोलन से जुड़े अभिभावक चन्द्रभूषण मिश्र कौशिक" जी से हुई वार्ता के कुछ_अंश -----
■ ?--अभिभावकों में स्कूली लूट को लेकर  विश्वास और बहिष्कार में  कोई अन्तःद्वन्द हैं क्या  ?
◆बिलकुल नहीं ऐसा तो इस लिए लग रहा हैं क्यों  की स्कूल और अभिभावकों के बीच सरकार ने एक कृतिम चश्मा जारी कर दिया हैं वो हैं ट्रस्ट ।इस लिए लोगों को लग रहा की स्कूली नीतियों का खिलाफत करने का मतलब सरकार का विरोध जब की यथार्थ यह हैं कि सरकार के संसाधनों के दुर्पयोग को रोकने का आंदोलन हो गया हैं शिक्षा आंदोलन ।
■?--सरकारी तंत्र और स्कूल मिले हैं । आपका यह कहना ठीक हैं क्या ---?
◆ विश्वास जिस भरोसे का है वो तो कही दिख ही नहीं रही बल्कि आज की भ्रष्टाचारी एकता  जग जाहिर हैं ।सरकार और प्रशासन को अभिभावकों के साथ खड़ा होना चाहिए था पर वो सब  निजी सामंती स्कूलों के छतरी के नीचे खड़े हो अभिभावकों के खिलाफ बयान और आदेश जारी कर रहे हैं । इसे देख क्या कहा जा सकता हैं ? यही तो आज अनैतिकता एक जुट हैं और नैतिकता में विखराव जो भारत में बढ़ते भ्रष्टाचार का मूल कारण भी हैं  ।
■क्या शासन ,प्रशासन के  नीति और नियत में खोट हैं यह कह कर आप उनकी मंशा पर सवाल उठा रहे हैं ?
 ◆जब नीति और नीयत दोनों एक दिशा में होते तो बात बनती बात विगड़ती बिलकुल नहीं ,पर आज का यकीनन सत्य यही हैं कि शासन ,प्रशासन उनके लिए काम कर रही हैं  जो आम नागरिकों पर शासन करने में सरकार को बल दे रहे । जब की नीतिगत मांग और न्याय संगत नागरिक सिर्फ अपनी दुर्बलता का बोध लिए न्याय के लिए सिर्फ इधर उधर  भटक रहे हैं  ।
■क्या आप कहना चाहते हैं कि सरकार आपके संसाधनों का आपके ही खिलाफ इस्तेमाल की नीति को प्रोत्साहित करती हैं ?
◆  सरकार और नागरिकों के बीच यही तो हो रहा हैं तभी तो दलाल व अनैतिक तंत्र सरकार के करीबी बन जा रहे हैं और आम नागरिक ,अभिभावक, किसान,मजदूर सरकार के सामने दया के भीख मांगने वाले भिखारियों  के भांति याचक  ।
■न्यायपालिका पर आपका विश्वास किस हद तक कायम हैं ।
◆एक नगरपालिका के कुर्सी पर बैठा जब उस कुर्सी पर बैठाने वाले को अपना दास बना दे रहा हैं तो न्यायपालिका तो बहुत बड़ा तंत्र हैं जिस प्रकार  लोकतंत्र से लोकहित गायब हैं उसी तरह से न्यायपालिका से जनहित का न्याय दूर हो गया हैं यह कहने की  बात नहीं समझने की बात हैं । तारीख पर तारीख का पड़ना , मसला जहाँ का तहाँ अटका रहना इसी दिशा में संकेत करता हैं  ।  
■आप कह रहे बिना पढ़ाई फीस उगाही नहीं होना चाहिए और स्कूलों का कहना हैं  हमारी जरूरत पूरी होनी चाहिए ?-----आखिर बात कैसे बनेगी !
◆अगर सबको शिक्षा का अधिकार न्यायसंगत हैं तो शिक्षा तंत्रों को न्यायसंगत नीति और नियत पर काम करना होगा ।जितनी पढ़ाई उतना फीस की समझ को स्वीकारना होगा पढ़ाई से ज्यादा बाहरी आडंबरों का बोलबाला ठीक नहीं ,न अभिभावकों से गलत लिया जाना  चाहिए  न स्कूल संचालन के लिए किसी शिक्षा अधिकारियों को कुछ गलत दिया जाना चाहिए   । स्कूल और अभिभावक एक  साथ हो जाएंगे तो स्कूली लूट और स्कूलों से लूट दोनों बंद हो सकता हैं ।
■क्या अभिभावक निजी स्कूलों के संसाधनों व सुविधाओं को  नजरअंदाज कर उनका मूल्यांकन कर रहे हैं ?
◆निजी स्कूलों के संसाधनों के बदले ही महंगी शिक्षा फीस भुगतान की प्रथा आयी हैं  । शिक्षा बेहतर तो सब जगह होनी चाहिए वो चाहे सरकारी स्कूल हो या निजी स्कूल।अगर ऐसा नहीं हो पा रहा तो यह भारत सरकार की नाकामी हैं सिर्फ जनता इसके लिए जिम्मेदार और दंड के भागी नहीं बननी चाहिए मेरा कहना यह हैं ।
■सरकार और निजी स्कूल पर अभी  तक अभिभावकों के आंदोलन का कितना दबाव पड़ा हैं । इस पर आपकी क्या राय हैं ?
◆  राजनैतिक इच्छा शक्ति अपने  लाभ के खिलाफ इतना जल्दी सुनेगी कम से कम मैं तो ऐसा नहीं मानता हूँ । क्यों की ट्रस्ट के आंगन में भ्रष्टों का बहुत बड़े पैमाने पर हिस्सेदारी हैं और इस हिस्सेदारी के रास्ते टैक्स चोरी से लेकर सामंती रसुकदारी की जड़े बहुत गहरी और घने  रूप में फैली हैं । इसे नजरअंदाज कर किसी परिणाम की आशा ठीक नहीं हैं ।
■फिर तो यह मान लिया जाय की आप सब सिर्फ पत्थर पर सर मार रहे हैं कुछ होना जाना नहीं हैं ?
◆हम सब तो आस्था से पत्थर को पूज उसमें भी देवत्व की ऊर्जा का एहसास रखने वाले लोग हैं । अभी तो जनजागरण के लिए समर्पण हो रहा, आने वाले समय में इस हवन में बहुत कुछ स्वाहा होगा इस विश्वास से आंदोलन की ऊर्जा दिनों दिन जीत की ओर ही बढ़ ही रही हैं । इसे कोई नजरअंदाज करता हैं तो यह उसकी भूल हैं ।
 ■धीरे धीरे कोरोना महामारी काल पर टाल मटोल कर सरकार और स्कूल नये सत्र में आ गए अब तो बाते ख़त्म होती नजर आ रही हैं फिर आप सब की तरफ से  आगे की रणनीति क्या होगी ?
◆कोई तूफान जब थमता हैं तभी इससे हुए नफा  ,नुकसान का सही विश्लेषण होता हैं ।
अभी ही  तो सही माने में अभिभावकों के अधिकार  ,स्कूली अन्याय और सरकार का रवैया व पक्ष,विपक्ष का चरित्र सब जनता को समझ आने लगा हैं । अभिभावकों के अंदर का कई एक भ्रम अब ही तो टूटा हैं । अब जो सवाल सरकार और स्कूलों के समक्ष आयेगे वही सवाल हुकूमत और उसके अलमबरदारों को बिना कपड़ों के कर देगे ।और उनके पीछे खड़े सारे के सारे थैलीशाहों के चेहरे साफ साफ नजर आने लगेंगे ।
■अब यह सवाल हैं कि आप सब सरकार के व्यवहार से ज्यादा निराश हैं या  स्कूलों के व्यवहार से ?
◆नीति सही दिशा में काम करें  । जनता के पक्ष में होने वाले सत्याग्रह को राजनैतिक तंत्र गंभीरता से लें । यह चाहत हर आम जनमानस के मन में हैं और रहेगा । जिस चाहत से जनता सरकारों को चुनती हैं उस चाहत पर उदासीन सरकार जनता में निराशा देने के पात्र बनती हैं पर कहे तो लूट और झूठ के मामले में  छोटे स्कूल मानवी हैं  जब की बड़े बड़े स्कूल ज्यादातर ही अमानवीय हैं कोरोना काल में हुए इस बोध से  अभिभावक चिंता में भी हैं और निराशा में भी । इसी पेंच ने सरकार और स्कूल के नीति और नीयत दोनों पर सवालिया निशान लगा दिया है। अब अभिभावक  भरोसा करे भी तो कैसे करे । अब तो उन्हें लगने लगा हैं  की वो तो विश्वास की आड़ में  लगातार ठगे  जाते रहे हैं । जिन नेताओं और पक्ष विपक्ष को वो अपना मानते रहे वो सब तो सामंती सोच और पैसों के बीच दंडवत की मुद्रा में बिछे पड़े हैं । पर एक बात कहना चाहूंगा  ऐसे हालात ने अभिभावकों को आईना भी खूब दिखाया जिससे इस आंदोलन को न सिर्फ  मजबूती मिली बल्कि कई मायनों में यह आंदोलन शिक्षा सुधारों में एक शिला लेख की भांति जनमानस के मन में अंकित भी हुआ हैं । जिसके कारण  पहली बार अभिभावक स्कूलों से जबाबदेही और सवाल पूछने लगे  है।
इस सवाल में उंगली स्कूल और  सरकार दोनों  पर उठी हैं दूसरी खास बात यह कि यह आंदोलन अभिभावकों द्वारा बिना नेता बिना बड़े नेर्तित्व के आम पीड़ित अभिभावकों ने अपने हिसाब से लड़ना शुरू किया हैं और अभी तक लड़ भी रहे हैं ।  अगर सब कुछ यूँ ही चलता रहा तो यह कहना शायद गलत न हो कि आज नहीं तो कल शिक्षा क्षेत्र के सेवा आड़ ले बाजारवादी समझ की  ताकतों को मुँह की खानी ही पड़ेगी ।
■आगे आंदोलित अभिभावकों से आप कुछ कहना चाहेंगे --
◆मैं कहना चाहता हूँ की जो अभिभावक  इस  परिस्थिति विशेष लड़ाई को खामोश तमाशबीन की तरह यह सोच कर देख रहे कि यह उनकी बात नही बल्कि  कुछ अशक्षम अभिभावकों का मामला है उन्हें इससे कुछ लेना देना नहीं तो वो गलत सोच रहें ,समझ रहे  । न तो भ्रष्टाचार की कोई सीमा हैं न भ्रष्टाचारी का कोई इमान ही ।
आज हम लुटे जाएंगे तो कल आपका भी नंबर आएगा अगर यही संकुचित सोच और विखराव रहा तो हर शख्स  इस स्कूली लूट का शिकार हो जायेगा और शिक्षा जैसी मौलिक जरूरत अमानवीय हो जायेगी ।।
■अंतर में आप कुछ अपनी बात जनता से सीधे कहना चाहेंगे ?
●मैं सामंती स्कूलों के अन्याय के खिलाफ अगर लड़ नहीं सकता तो संघर्ष करते करते मर तो सकता हूँ । यह मेरी कायरता होगी या मेरा सत्याग्रह यही समाज को तय करना हैं । आज अभिभावकों द्वारा भूख हड़ताल और  कल आमरण अनशन भी होगा ।
सत्य जीते यह कोशिश हमारी तरफ से  होगी अगर सत्य हारा तो शिक्षा की गुणवत्ता का पतन होगा और कुछ भी नहीं । -----चन्द्र भूषण मिश्र "कौशिक"】

Saturday, January 9, 2021

कोरोना महामारी में अभिभावक लाचार स्कूलों को चाहिए सिर्फ फीस और अपना व्यापार


 स्कूली बच्चों के अभिभावक और कान्वेंट विचार के निजी स्कूलों के प्रबंधक आमने-सामने और दर्शक बनी सरकार और सरकारी नीतियां  !------एक समीक्षा ◆
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●क्या सरकार अभिभावक को निराश और निजी स्कूलों को आक्रामक बना कर शिक्षा में व्याप्त भ्रष्टाचार को संरक्षित व संवर्धित कर रही है ?
यह सवाल जनता के प्रति सरकार की उदासीनता और निजी स्कूलों के अड़ियल रवैए को देखकर जनमानस के मन में आने लगा है. हम निजी विद्यालयों में अपने बच्चे को अपने आर्थिक मानक के आधार पर भेजते हैं। यानी जहां तक हम अपने को सक्षम पाते हैं ,वहां तक  बेहतर शिक्षा की संभावनाओं के चाह से हम अपने बच्चों के लिए स्कूलों का चयन करते हैं ।
 लेकिन आज कल  फीस में राहत की जो मांग हैं वो हमारी सक्षमता और अशक्षमता  का विषय हैं ही नहीं , बल्कि कोरोना  आपदा काल में अस्त व्यस्त आर्थिक तंत्रों के दुष्परिणाम पर राहत और समाधान को लेकर है ।
                                  जाने क्यों --यह सचं  समझने की जगह आज की राजनैतिक शक्तियां ,पक्ष ,विपक्ष सब के सब हम अभिभावकों की  हैसियत समझने और समझाने में लगी हुयी हैं ।
आज सरकार जनता की हैं या निजी स्कूलों के लिए यह अभिभावकों के मन की पीड़ा ही फीस आन्दोलन का कारण बना हैं । क्यों की जनमानस के मन में आदर्श सरकार के प्रति राय बनी हैं कि आपदा में व्यक्ति ,क्षेत्र ,वर्ग जैसे  मानक का कोई महत्व नहीं होता क्यों कि आपदा परिस्थित विशेष में क्षति और हानि की प्रतीक होती हैं. और इसमें मानवता हित की प्राथमिकता ही सबसे बड़ी सरकारी कर्तव्य की सरकार की प्राथमिकता होती हैं ।
               लेकिन व्यवहार में कोरोना आपदा में
【स्कूल बंद फीस जारी और शिथिल सरकार हमारी 】
जैसे हालात के बढ़ने और फीस की जगह लगान वसूले जाने की प्रवृति को बल मिलने से कई सवाल अभिभावकों के मन में आने लगे हैं जैसे --------
■ क्या सरकार और जनप्रतिनिधियों में अनैतिक धन उगाही की चाह प्रबल हो गई हैं . और ऐसे उपक्रम के हिस्सेदारों में इनकी सहभागिता और  बाहुल्यता हो गईं हैं । यानी शिक्षा सेवा के नाम पर कर की चोरी का एक सुरक्षित साधन के रूप में स्कूली शिक्षा को व्यापार बना कर शासन, प्रशासन इसका संरक्षण और जन हितों का भक्षण कर रहे हैं ।    
■क्या शिक्षा में मानवी परिणाम के व्यवहार में न आने पर भी विपक्ष का मौन रहना और अभिभावकों के हितों को नजरअंदाज कर अमानवीय सरकारी नीतियों के खिलाफ आवाज नहीं उठाना विपक्ष और पक्ष का मिल भ्रष्टाचारी तंत्रों से निज् लाभ का स्वार्थ सिद्धि का सचं जगजाहिर होने लगा हैं ।
■क्या अब मान लिया जाय की  सरकार जनसेवा और जनकल्याण के कार्य पालन की निगरानी की जगह  सिर्फ एक  दल बन गई हैं जो सिर्फ अपने लाभ हानि के मूल्यांकन पर ही विश्वास करती हैं ।
■क्या मानवीय जरूरतों और परिस्थितियों पर भी  अमानवीय हल के लिए ही सरकार हैं या फिर  हाथी के दाँत खाने और दिखाने के अलग अलग हैं ।
■क्या जनसेवा का कुर्ता  पहन लोग अब लूट के पायजामे को छिपाने की नीति से शिक्षा सेवा संस्थाओं को अपने संरक्षण में भ्रष्टाचार युक्त बने रहने के लिए फलने फूलने और  छिपने , छिपाने का सिर्फ नीति और नियत ढो रहे हैं ।
■क्या जनता के हित की जिम्मेदारी लेने वाले जनप्रतिनिधि सिर्फ व्यापार और व्यापारी बन कर ही जन समस्याओं को सुन और समझ रहे हैं ।
■क्या  न्यायपालिका ,कार्यपालिका सब के सब आर्थिक सबलता की आधीनता स्वीकार चिंतन करने लगे हैं ।
■क्या जन आन्दोलनों की समीक्षा की जगह उसकी उपेक्षा की परंपरा  इस लिए व्यवहार में प्रबल हो रही ताकि  जनता में  निर्बलता  और दुर्बलता बनी रहे और कृपा और दया की याचना से ऊपर उनकी समझ और अधिकार की स्थिति परिस्थिति न बन सके ।
■क्या अनैतिक अर्थ उगाही के लिए स्कूल एक नैतिक माध्यम की लोकप्रियता हासिल कर लिया हैं जिसके सहारे  सरकार के आँख में सेवा का चोला पहन सबसे अच्छे और सम्मानित रूप रेखा में धूल झोकने का सफल परीक्षण चक्र बेरोक टोक चल पड़ा हैं और इस रोड मैप में पक्ष विपक्ष एक बराबर हिस्सा पाने लगे हैं ।
■क्या स्कूल और चिकित्सा कहने को सिर्फ सेवा हैं लेकिन व्यवहार में लूट ,झूठ और अनैतिक कमाई का व्यापार बन गया हैं। जिसका जनसेवक बन ज्यादातर सबल लोग लाभ उठा रहे हैं और सरकार इस सचं को छिपाने में सहयोगी बन रही हैं ।
■ क्या भ्रष्टाचार से कमाए रूपये और मेहनतकश कमाई को एक  प्रकार के मानक से देखने का सरकारी नीति और नियत ही दोषपूर्ण चरित्र का पोषक बन बैठी हैं ।
                      #जनहित की जबाबदेही की उपेक्षा पर जनता में एकता का न होना  । दल की  दलदल में फसकर जनबल का विखर जाना ही भ्रष्टाचारी शक्तियों के लिए संजीवनी हैं ।  वर्ना जनता की  भावनाओं और  उनकी जरूरतों को व्यापार बना भारत का लोकतंत्र इस तरह से भ्रष्ट स्कूली नीतियों के सामने गुलाम बन खड़ा न होता अब तक सरकार भ्रष्ट स्कूली व्यवस्था के खिलाफ जनता के साथ खड़ी हो गई होती ।।
-------------चन्द्र भूषण मिश्र "कौशिक'

Friday, October 2, 2020

प्राइवेट स्कूलों में बढ़ती सामंती सोच अब जगजाहिर हैं ।


 अब सवाल हैं कि क्या अभिभावक इन सामन्ती सोच से लड़ सकेगा-- जीत सकेगा ।
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 ■अपने बच्चे के लिए  उज्ज्वल भविष्य का सपना देखने वाले अभिभावकों को आज प्राइवेट स्कूलों ने ऐसे ऐसे सपने दिखा दिये हैं की वो मान बैठा हैं कि स्कूल जितना वैभवशाली होगा वहा से निकले बच्चे उतना वैभव अर्जित कर सकेंगे । इस भ्रम के पीछे का सचं हैं कि  भले शिक्षा का स्तर कुछ भी हो बस आव भाव में अंग्रेजियत दिखती रहनी चाहिए ! यही समझ हो गई है ज्यादातर अभिभावकों की --------
अगर तुम गुलाम रहने को तैयार हो तो वो गुलांमी करवाने को तैयार हैं यही सम्बन्ध हो गया हैं स्कूल और अभिभावकों के बीच ।
जब लूट का दौर होगा तो हम भ्रामित उसमें पिसेंगे और हमें पीसने वाले हमारा भोग करेगे यही तो परंपरा रही हैं
यही कारण हैं कि ---निजी स्कूल बिना रोक टोक के  सामंती सोच के होते जा रहे ---
देश का कोई हिस्सा हो हर जगह का सच एक हो गया हैं कि  प्राइवेट स्कूल आज लूट का अड्डा बन चुके हैं। इन बड़े स्कूलों में एडमिशन के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये का खेल होता है। एडमिशन के लिए स्कूल के बाहर प्रचार तंत्र और  दलाल सक्रिय रहते हैं जो लाखों में रकम  का वारा न्यारा कर एडमिशन को लोक प्रिय और स्टेट्स का प्रतिक बना हमें ,उनको ,सबको भ्रम में डाल देते है । इस खेल में सिर्फ बिचौलिए ही सक्रिय नहीं है, बल्कि सरकारी पदों पर बैठे कुछ रसूकदार लोग भी मिशन एडमिशन के इस खेल के माहिर खिलाड़ी हैं। पहले तो ये सहज सुलभ और सस्ती शिक्षा का माखौल उड़ाते हैं फिर उसके संसाधनों को मिल बाट कर खा जाते हैं और अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ सामंती व्यवस्था में निज् लोभ लालच से जुड़ अनैतिकता को संरक्षण देने के साथ साथ उनका गुणगान करने लगते हैं ।
जब सैया भये कोतवाल तो डर काहे का -----
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यही कारण हैं कि आज अपनी पहुंच और रसूक का हवाला देते हुए ये सामंती स्कूल लोग अभिभावक को इस कदर परेशान करते हैं कि वह लड़ने से पहले ही हार स्वीकार कर लेते हैं ।
और फिर क्या ?  लूट का यह सारा खेल सहजता से जारी रहता है बिना किसी रोकटोक के ----
और साथ गलबहियां करते रहते  हैं   स्कूल प्रबंधन, स्थानीय पुलिस, शिक्षा विभाग, प्रशासनिक अधिकारी, नेता,मिडिया  और कुछ रसूकदार लोग ।
दिखावे के लिए वैसे तो सरकार प्राइवेट स्कूलों में एडमिशन के नाम पर वर्षों से जारी इस लूट पर लगाम लगाने के कई दावे करती है, लेकिन सभी खोखले ही साबित हुए है। सरकार की तरफ से फीस रेगुलेशन एक्ट लागू तो कर दिया है आदर्श घोषणाओं में तो यह भी कहा गया कि सरकारी लोगों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढेंगे  पर उसे अमल में नहीं लाया जा सका। ऐसे में अभिभावकों का  शोषण दोहन बेरोकटोक जारी है यह कहना भी आसान नहीं क्यों की शिकायत सुनने वाला भी   आपको सुनने को पहले तो तैयार नहीं हैं और अगर सुन भी लिया तो उसका उत्तर स्कूलों के पक्ष में लिखा जाए इसका सौदा तो शिकायत सुनने से पहले ही तय कर रखा गया हैं ।
आज का सर्वमान्य सचं है की प्राइवेट सकूल कदम-कदम पर शोषण करते हैं। पहले स्कूल का महंगे फॉर्म लेने के लिए लंबी कतार, फॉर्म मिलने के बाद उसे जमा करने की कतार। इसके बाद बच्चे के नाम पर अभिभावकों को स्कूल प्रशासन के सामने इंटरव्यू की प्रक्रिया से गुजरने का पाखण्डी अभियान । स्कूल में डोनेशन के नाम पर मोटी रकम चढ़ावा । 10 माह के शिक्षा काल के बदले 14 माह की फीस वसूली का प्रावधान ।
हर एक गतिविधि के लिए अलग अलग नाम से वसूली का प्रावधान ।
इस खेल में अकेले स्कूल ही हिस्सेदार नहीं हैं ।दलाल से लेकर सरकारी तबके पर बैठे लोगों तक को मोटी रकम लेनदेन का भ्रष्ट व्यवहार का लूट झूठ भी इसमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में शामिल हैं ।  यही कारण हैं की अभिभावकों को इतना प्रताड़ना सहने के बाद भी  छात्रों को  सही शिक्षा की  कोई गारंटी नहीं होती।
छात्र की हर अच्छाई के लिए स्कूल को उपहार और कमजोरी के लिए अभिभावकों पर दंड भार यही इन निजी स्कूलों की अब तक की विशिष्ट  उपलब्धि हैं । सचं तो यह भी हैं कि अतिरिक्त कोचिंग के बिना  अभिभावक निश्चिंत नहीं हो सकते हैं की उनका बच्चा कुछ बेहतर सीख भी रहा हैं ।
इस समझ के  बावजूद भी लूट नहीं रुकता और  जारी होती रहती हैं शोषण की नई नई किश्ते जैसे ---
 स्कूल यूनिफार्म कहां से लेनी है,
 किताबों के लिए किस दुकान में जाना है,
बस या कार से बच्चे को स्कूल तक लाना है,
 तो इसकी परेशानी अभिभावकों को खुद उठानी होगी या मनमांनी धन उगाही की बोझ उठानी होगी ।
इतना करने के बावजूद भी  स्कूल जिम्मेदार नहीं। बच्चा पास कर गया तो स्कूल को श्रेय अगर  फेल हो गया तो सब कुछ अभिभावक की जिम्मेदारी -----
पास छात्रों पर नए सिरे से रजिस्ट्रेशन कराने के बाद एक बार फिर से उसी यूनिफार्म, किताब के चक्कर से गुजार नई कमाई की नई जुगत का फिर से श्रीगणेश  ।
और फेल के अभिभावकों को फिर लूट की चक्की में पीसने का उपदेशात्मक सन्देश ।
दया दुआ न शिक्षक से न छात्र से पर सरकार की सरकारी कागजो में स्कूलों में राइट टू एजुकेशन  हैं ---ऐसी  बड़ी बड़ी डिगें आपने भी सुनी होगी -----
आपने भी सुना होगा की सरकारें   25 फीसदी गरीब बच्चों के एडमिशन का क़ानूनी  दावा होता है लेकिन सरकारी धन का गोलमाल करने के लिए स्कूल बच्चों की फर्जी सूची सरकार विभाग को दे देते हैं। आरोप तो यह भी है कि ऐसे बच्चों से स्कूल एक तरफ फीस लेता ही है दूसरी तरफ सरकार से भी उन्हीं बच्चों की सूची देकर बड़ी रकम ले लेते हैं। गरीब बच्चों के कोटे पर ही रिश्वत लेकर दूसरे बच्चों का भी एडमिशन कर दिया जाता है। स्कूलों के खेल में सरकार दलाल मालिक होते हैं और अभिभावक बलि के बकरे । सरकार की समान शिक्षा की मंशा  कोरोना आपदा में तो नग्न सच के रूप में ही आम लोगो के बीच आ गईं ।
फीस और फिरौती दोनों की वसूली एक सा दिखी ।
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अभिभावकों की विवशता को स्कूलों ने खूब भजाया या कह ले कोरोना आपदा के समय को स्कूली लुटेरों ने खूब अवसर के रूप में अपनाया ।
● स्कूल के मेसेज किसी  धमकी से कम नहीं रहे .
● सरकार की नीति नियत अभिभावकों के हक में बिलकुल ही नहीं रही ।
●सब कुछ वसूला जाता रहा अभिभावकों को स्कूली स्वार्थ की चक्की में पिसा जाता रहा पर सरकार भी लाचार दिखी ।
◆विज्ञापन के नाम पर मीडिया को झुकाया गया बच्चो का भविष्य खराब कर देने के डर को दिखा अभिभावकों को सताया गया ।
●स्कूल सेवा केंद्र हैं इस सबसे बड़े झूठ को सरकार के मेलजोल से मिल अभिभावकों को जबरन स्वीकार कराया गया ।
●शिक्षकों को आगे कर लूट को आदर्श बता अभिभावक और शिक्षक दोनों को बंधक बना उनके अधिकार पर
कब्जा कर स्कूली दूकान चलाया गया ।
●स्कूली सोच को सामंती मान देकर सच को छुपाया गया अभिभावकों को डराया गया और चल रही लूट को आगे बढ़ाया गया ।
●आम जन लाचार रहा स्कूलों में दुराचार रहा नेताओं में स्वार्थ रहा और सरकार एक बार फिर इस बात का गवाह रही की ------
।लोक तंत्र झूठ हैं ।
देश में लुटेरों को  मनमांनी लूट करने का छूट हैं ।।
मेरी समझ की बस एक छोटी सी कोशिश हैं  हमारे बच्चों को बेहरत शिक्षा का आयाम मिले लूट झूठ शोषणकारी स्कूली काला कारोबार को विराम मिले ।
यही हैं ------
अभिभावकों की मांग
यही हैं ---शिक्षा आंदोलन का अभियान । ।
------------चन्द्र भूषण मिश्र "कौशिक"

Friday, September 25, 2020

इंदिरा गाँधी चाहती तो पंडित दीनदयाल उपाध्याय के हत्यारे पकड़े जाते


11 फरवरी 1968 को मुगलसराय रेलवे स्टेशन पर ट्रैक के बीच में एक शव मिला था। ये शव किसी आम आदमी का नही, भारत के उस समय के सबसे प्रखर राष्ट्रवादी और सनातन धर्म प्रचारक नेता, पंडित दीनदयाल उपाध्याय का था। ये वो पंडित दीन दयाल उपाध्याय थे, जिनका सामना उस समय की प्रधानमंत्री ........इंदिरा गाँधी ही नही उनके पिता नेहरु भी करने से डरते थे। ये वो पंडित दीन दयाल उपाध्याय थे, जिन्होंने जनसंघ की नीव रख कर, भारत की राजनीती को एक नई पहचान दी। ये वो पंडित दीन दयाल उपाध्याय थे, जिन्होंने राष्ट्र धर्म के प्रचार में अपना जीवन लगा दिया।

इनके राष्ट्र के प्रति योगदान की बात जितनी की जाए कम है। बेहद साधारण से रहने वाले ये व्यक्ति, 11 फरवरी 1968 को रेल से पटना जा रहे थे, और उसी रात किसी ने उनकी हत्या कर शव मुगलसराय, जो अब पंडित दीं दयाल उपाध्याय स्टेशन हो गया है, पर फेक दिया। और अफ़सोस की हम इनके कातिलो का पता तक नही लगा पाए। इनकी हत्या पर 302 का मुकदमा भी नही चला, और Attempt to Murder का केस लगा कर 2 चोरो को मात्र 4 साल की सजा दे दी गई। ये कहकर की चोरो ने सिर्फ लूट के इरादे से उन्हें ट्रेन से धक्का दिया था। यहाँ तक की CBI भी इनकी हत्या को साबित नही कर पाई और आज भी इनकी मौत एक राज है

 उस समय की सरकार ने इतने बड़े नेता की हत्या को, इतने हलके में लिया और CBI जाँच के नाम पर मर्डर को सिर्फ attempt to murder दिखा कर केस खत्म कर दिया। वो अलग बात है की, दबे जुबान हर कोई इसे राजनितिक हत्या का करार दे रहा था, पर सुनने वाला कोई नही था उस समय।

नमन है उन्ही पंडित दीन दयाल उपाध्याय को, जिन्होने  25 सितम्बर 1916 को मथुरा के एक निर्धन परिवार में जन्म लिया और बचपन में ही अनाथ हो जाने पर भी, इन्होने स्नातक की पढाई तक गोल्ड मैडल हासिल किया। और अपनी दूरदर्शिता से इन्होने, नेहरु की हर गलत निति का विरोध कर,
उसका सही विकल्प भी दिया। पर अहंकारी और सत्ता के नशे में चूर व्यक्ति कहाँ किसी की सुनता है, और वैसा ही करते हुए नेहरु ने अपने जीवन में वो हर गलत फैसला लिया, जिसके चलते देश को काफी नुक्सान उठाना पड़ा।

Friday, September 11, 2020

बिहारियों को मुंबई से भगाने वाला ठाकरे परिवार खुद बिहारी है


 मुंबई की राजनीति में अगर आप जरा भी दिलचस्पी रखते हैं तो ठाकरे परिवार का नाम आपने जरूर सुना होगा। हम उसी ठाकरे परिवार की बात कर रहे हैं जो आए दिन अखबारों की सुर्खियों में बने रहते हैं। उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे ये ऐसा नाम है जो मुम्बई वासियों के जुबां पर हमेशा ही आता रहता है। राज ठाकरे के हिस्से में है शिव सेना तो वहीं उद्धव ठाकरे के हिस्से में है महाराष्ट्र नव निर्माण सेना। ये दोनों बंधु महाराष्ट्र की अस्मिता पर अपनी राजनीति करते हैं।

दरअसल हाल ही में एक किताब लॉन्च हुई है जो कि पूरी तरह से ठाकरे परिवार पर बेस्ड है या यूँ कह ले कि ठाकरे बंधुओं का पूरा ऐतिहासिक परिचय इस किताब में दिया है। लेकिन इन सब के बीच कुछ खुलासे ऐसे भी हुए जिसे जानने के बाद हर कोई दंग रह जाएगा।

 सबसे पहले जान लेते उस किताब के बारे में जिसमें इनके बारे में कई खुलासे हुए है, उस किताब का नाम है The cousins Thackeray: Uddhav Raj and The Shadow of their senas इसके लेखक हैं पत्रकार धवल कुलकर्णी। इस किताब में दावा किया गया है वो यह कि बिहारियों को मुम्बई से बाहर निकलने वाले ठाकरे खुद बिहारी हैं। जी हां ये सुनकर आपको हैरानी जरूर हो रही होगी पर इस किताब की मानें तो यही सच है।

 आपने कई बार ये खबरें सुनी होंगी की ठाकरे द्वारा मुम्बई से यूपी व बिहारियों को बाहर निकाला जा रहा है पर उस दौरान आपको ये नहीं पता होगा कि ऐसा विरोधिपन दिखाने वाले ये ठाकरे बंधु खुद बिहारी ही हैं। इस किताब में राज ठाकरे व उद्धव ठाकरे के दादा केशव सीताराम ठाकरे की भी चर्चा की गई है जिसमें बताया गया है कि ठाकरे परिवार मूल रूप से चंद्रसेनी कायस्थ परिवार से संबंध रखता है। अगर आप इतिहास पर थोड़ा टटोलेंगे तो जान पाएंगे कि चंद्रसेनी कायस्थ परिवार के लोग मगध से जुड़े होते थे जो की बिहार के अंदर ही आता है।

 इस समुदाय के लोगों ने काफी लंबे समय तक मगध में निवास किया, पर आगे चलकर व्यपार, युद्ध या फिर अन्य काम के लिए ये मगध से बाहर चले गए। देखते ही देखते महाराष्ट्र में इनकी संख्या ज्यादा हुई और इनकी रिहायशी भी मजबूत हो गयी। अब इसी बात को लेकर बवाल हो रहा है कि अगर ठाकरे बंधु मूलरूप से मगध से संबंध रखते हैं तो अपनी ताकत व रिहायशी के बल पर मजदूरी करने वाले व गरीब तबके के लोग जो बिहारी मुम्बई में निवास कर रहे थे उनके खिलाफ ऐसा व्यवहार करना कितना जायज है।

इतना ही नहीं की रिपोर्टों में तो ये भी सामने आया था कि ये लोग यूपी बिहार से आये लोगों को मारकर, डरा धमकाकर बाहर निकाल रहे थें जिसका वीडियो भी सामने आया था लेकिन इस खुलासे के होने के बाद कई विपक्षी दल के नेता इसपर सवाल उठाने लगे कि खुद बिहार से होकर आप ऐसा कैसे कर सकते है?


Sunday, August 9, 2020

#भारतसेजुडो #भारतीयताअपनाओ #भारतकोबनाओ_बचाओं_आगे_बढ़ाओ

 ●••यही आज-------------राष्ट्र हित की राष्ट्रीय क्रांति हैं । । भारत माता की जय ।।
याद रहे ! भारत को कमजोर करने वाली समझ ,सोच, विचार, व्यवहार को भारत छोड़ो को विवश करने ' कहने से पहले सच्चे मन से समझ लो- राष्ट्र हित सर्वोपरि समझ की हमारी एकता,सजगता व व्यवहारिकता ही भारत को विश्वगुरु बना सकती हैं । और भारत में व्यापत भ्रष्टाचार ,दुराचार,अनाचार से भारतीयों  को मुक्ति दिला सकती हैं । इसके लिए सिर्फ राष्ट्र सपूतों को पूजना ही नहीं ,सबको सच्चा राष्ट्र सपूत बनना भी होगा । धर्म जात ऊँचनीच के भेद भाव को अपने निज् मन से बाहर कर सिर्फ देश और सच्चे देशवाशियों के लिए लड़ना होगा ।
#स्मरण_रहे --जब जब भारत ऐसे इच्छा शक्ति से लड़ा हैं  तो जरूर जीता हैं  ।

■आज क्रांति के समग्र दृष्टिकोण से हम भारत व भारतीय आदिवासी समाज का जल जंगल जमीन यानि अपनी मातृभूमि से सहृदय प्रेम और इस प्रेम में समाहित राष्ट्रीय चिंता और चेतना संबध्य  भारत की आजादी के संघर्ष में बलिदान त्याग तप व तपस्या पर हुयी आहुति को स्मरण करते हुए कहना चाह रहा  हूँ की----
👍हम भारतीय आदिवासी अभिशप्त नहीं ,विश्व के सबसे सशक्त मानवीय चेतना हैं । आप आदिवासी का मतलब क्या समझते हैं. यह तो मैं नहीं जानता लेकिन मैं जो समझता हूँ । उसके अनुसार हम विश्व की कृतिम  वातावरण में एक मौलिक मानवीय हस्ताक्षर के प्रतीक के रूप हैं ---मैं तो यही  जानता और समझता रहा हूँ । वर्तमान परिवेश के अपने देश में  यह कहा जा सकता हैं कि जंगली आदिवाशी ,ग्रामीण आदिवासी व शहरी आदिवाशी के खंड में तो नहीं कड़ीगत (चेन) में हम अलग अलग कुनबों व विचारों में फैल से गये हैं। जिससे हम एक हो कर भी खंड खंड भाव ,भावनाओं के प्रभाव में ऐसे जकड़ गये हैं कि राष्ट्र की श्रेष्ठा से खुद की श्रेष्ठता हमें ज्यादा प्यारी लगने लगी हैं । और ऐसे हालात में हमारे में अपने मौलिक समझ का बने रह पाना मुझे तो  मिथ्या और एक अव्यवहारिक समझ ही लगता हैं  । यही कारण हैं कि  हम सब  अपने संस्कार ,संस्कृति आकृति और प्रकृति के विपरीत जाने को तैयार हो आदिवाशी समझ को समझने की जगह उसे उपेक्षा का विषय कहना और समझाना शुरू कर दिये हैं ।
इस बदलाव ने ही तो हमारे  अनुशासन और प्रशासन दोनों को कृतिम विदेशी  मन माफितों के  गुलांमी की दशा दिशा में जाने को ढकेल दिया ।और फिर क्या था --हम आदिवासी भी नहीं और भारतवाशी भी न रह सके ।

👍भारत छोड़ो आंदोलन की क्या अब जरुरत नहीं रही ?••••••धर्म की जय हो अधर्म का नाश हो से आजादी को जोड़ते हुए मैं जब भी न्याय और नीति की समझ की ओर देखता हूँ . तो मुझे लगता हैं ।अंग्रेजों की जाने के बाद भी  भारत में अंग्रेजीयत बनी रह गई ।उसी तरह से जिस तरह से भारत राष्ट्र पिता के हाथों से निकल ऐसे व्यक्ति के हाथ में आ गई जो जन्म से भारतीय था ,पर तनं मन के विचारों से वो भारतीयता को जी सकने में बिलकुल सक्षम न था । परंतु दायित्व भारत से जुड़ा था इस लिए उन्होंने खुद को भारत के संस्कार और संस्कृति के अनुकूल करने के बजाय भारत और भारतीयता को बदल अंग्रेजी समझ के करीब कर दिया ताकि भारत आजाद भारत बन तो जाए पर भारतीयता को आजादी की समझ न हो सके । इसी का परिणाम हुआ की धर्म की जय की जगह--- धर्म विमुखता की जय को धर्म निरपेक्षता का नाम दे दिया गया । और  हम सब नया भारत नई सोच के नाम पर उस ओर बढ़ा दिए गए जिस ओर आजाद भारत को कभी जाने की कोई जरूरत ही नहीं थी ।

●मेरे ख्याल से धर्म निरपेक्षता नहीं भारत की सबलता ,सुरक्षा और श्रेष्ठता की बात होनी चाहिए थी ।
जिस समय आजाद भारत की अनुभूति के साथ हमारे राजनीति को भारत और भारतीय जरुरत के अनुकूल चलना चाहिए था । दुर्भाग्यवश उस समय भारत की राजनीती को ही, अपने राजनैतिक जरूरतों के आधार पर भारत और भारतीयता को गढ़ने में लग या लगा दिया गया ।
 परिणामतः जो भारत की  मौलिक विचारधारा थी उसमें अपने स्वरुचि के स्वाद और अपनी जरूरतों के वाद भर दिए गए ।।

◆हम सब विकल्पहीन कभी नहीं थे ----
बाएं अगर समस्याएं थी तो दाहिने हमारे पास इसका समुचित समाधान भी था .लेकिन सिर्फ समस्याओं को दिखा कर व समाधान को छिपा कर हमें इस तरह से छला गया कि हमें छले जाने के बोध के बावजूद हमें छले जाने पर दुःख न हुआ ।
और हम छलाओं को स्वीकारने को ही बदलाव मानते गये ।
देश से जुड़ों और खुद को देश से जोड़ो ।
कहने की अभी जरुरत हैं ताकि भारत में भारत के संस्कार के साथ आपसी आत्मिक प्यार का पदार्पण हो सकें और न्याय राष्ट्र धर्म प्रिय बने और अधर्म अन्याय दंडनीय ।।
भृष्टाचार ,दुराचार,दलाली ,गद्दारी ,बेरोजगारी, गरीबी, शोषण, जातपात भेदभाव -- भारत छोड़ो !
यही आज की आजादी की लड़ाई हैं ।।

चन्द्र भूषण मिश्र "कौशिक"
संरक्षक परिवर्तन परिवार

Monday, July 27, 2020

लांस नायक सतवीर सिंह जी के साथ न्याय नहीं हुआ


जैसे ही हमारे सामने कोई देशभक्ति का गीत बजता है वैसे ही हमारे भीतर एक जोश और जज्बा जागृत हो जाता है। हमारे देश की रक्षा करने के लिए सैनिक अपने प्राणों की आहुति हंसते हंसते दे देते हैं। ऐसे ही एक वीर सपूत दिल्ली में हैं जिन्होंने कारगिल युद्ध की लड़ाई लड़ी। लांस नायक सतवीर सिंह दिल्ली के ही मुखमेलपुर गांव में रहते हैं। वह करगिल युद्ध के दिल्ली से इकलौते जाबांज हैं। 19 साल बीत गए, पैर में आज भी पाकिस्तान की एक गोली फंसी हुई है, जिसकी वजह से चल फिर नहीं सकते। बैसाखी ही एक सहारा है। यह योद्धा करगिल की लड़ाई जीते, मगर हक के लिए सरकारी सिस्टम से लड़ते हुए हार गए।

वह कहते हैं, ’13 साल 11 महीने नौकरी की। मेडिकल ग्राउंड पर अनफिट करार दिया। दिल्ली का अकेला सिपाही था। सर्विस सेवा स्पेशल मेडल मिला। सरकार ने जमीन व उस पर पेट्रोल पंप देने का वादा किया। उसी दरम्यान एक बड़ी पार्टी के नेता की तरफ से संपर्क किया गया। ऑफर दिया कि पेट्रोल पंप उनके नाम कर दूं। मैंने इनकार किया तो सब कुछ छीन लिया गया। 19 साल से फाइलें पीएम, राष्ट्रपति, मंत्रालयों में घूम रही हैं। आज तक कोई नहीं मिला। कोई मदद नहीं मिली। सम्मान नहीं मिला। डिफेंस ने सम्मान बरकार रखा।’ मजबूरन अब उन्होंने जूस की दुकान खोली और अब खुद ही ग्राहकों के जूठे बर्तन धो रहे हैं।

सतवीर सिंह ने करीब 14 साल फौज में रहते हुए देश की सेवा की। देश के लिए लड़ते हुए लांस नायक सतबीर सिंह के पैर में दो गोलियां लगी थी।जिसमे से एक गोली अभी भी उनके पैर में ही फंसी हुई है ,जिसकी वजह से वह ठीक से चल फिर नहीं सकते और बैसाखी ही एक सहारा है, पर उनको अपाहिज पैर में फंसी हुई इस गोली ने नहीं बल्कि देश के सड़े गले सरकारी सिस्टम और भ्रष्ट  राजनीति ने कर दिया ,इन्होने देश के लिए करगिल की लड़ाई जीती , मगर अपने हक के लिए देश के सिस्टम से लड़ते हुए हार गए... ये देश के असली हीरो है।

परिवर्तन योगेश संस्थान की ओर से युवा संस्कार उपाधि अलंकरण 2022

  चन्दौली ब्यूरो / डीडीयू नगर, उत्तर प्रदेश पत्रकार परिषद द्वारा पूर्वांचल रत्न अलंकरण सम्मान समारोह 2022 का भव्य आयोजन नगर के केसरी नंदन उत...