11 फरवरी 1968 को मुगलसराय रेलवे स्टेशन पर ट्रैक के बीच में एक शव मिला था।
ये शव किसी आम आदमी का नही, भारत के उस समय के सबसे प्रखर राष्ट्रवादी और सनातन धर्म प्रचारक नेता, पंडित दीनदयाल उपाध्याय का था।
ये वो पंडित दीन दयाल उपाध्याय थे, जिनका सामना उस समय की प्रधानमंत्री ........इंदिरा गाँधी ही नही उनके पिता नेहरु भी करने से डरते थे।
ये वो पंडित दीन दयाल उपाध्याय थे, जिन्होंने जनसंघ की नीव रख कर, भारत की राजनीती को एक नई पहचान दी।
ये वो पंडित दीन दयाल उपाध्याय थे, जिन्होंने राष्ट्र धर्म के प्रचार में अपना जीवन लगा दिया।
इनके राष्ट्र के प्रति योगदान की बात जितनी की जाए कम है। बेहद साधारण से रहने वाले ये व्यक्ति, 11 फरवरी 1968 को रेल से पटना जा रहे थे, और उसी रात किसी ने उनकी हत्या कर शव मुगलसराय, जो अब पंडित दीं दयाल उपाध्याय स्टेशन हो गया है, पर फेक दिया। और अफ़सोस की हम इनके कातिलो का पता तक नही लगा पाए। इनकी हत्या पर 302 का मुकदमा भी नही चला, और Attempt to Murder का केस लगा कर 2 चोरो को मात्र 4 साल की सजा दे दी गई। ये कहकर की चोरो ने सिर्फ लूट के इरादे से उन्हें ट्रेन से धक्का दिया था। यहाँ तक की CBI भी इनकी हत्या को साबित नही कर पाई और आज भी इनकी मौत एक राज है।
उस समय की सरकार ने इतने बड़े नेता की हत्या को, इतने हलके में लिया और CBI जाँच के नाम पर मर्डर को सिर्फ attempt to murder दिखा कर केस खत्म कर दिया। वो अलग बात है की, दबे जुबान हर कोई इसे राजनितिक हत्या का करार दे रहा था, पर सुनने वाला कोई नही था उस समय।
नमन है उन्ही पंडित दीन दयाल उपाध्याय को, जिन्होने 25 सितम्बर 1916 को मथुरा के एक निर्धन परिवार में जन्म लिया और बचपन में ही अनाथ हो जाने पर भी, इन्होने स्नातक की पढाई तक गोल्ड मैडल हासिल किया।
और अपनी दूरदर्शिता से इन्होने, नेहरु की हर गलत निति का विरोध कर,
उसका सही विकल्प भी दिया।
पर अहंकारी और सत्ता के नशे में चूर व्यक्ति कहाँ किसी की सुनता है, और वैसा ही करते हुए नेहरु ने अपने जीवन में वो हर गलत फैसला लिया, जिसके चलते देश को काफी नुक्सान उठाना पड़ा।

