Monday, July 27, 2020

लांस नायक सतवीर सिंह जी के साथ न्याय नहीं हुआ


जैसे ही हमारे सामने कोई देशभक्ति का गीत बजता है वैसे ही हमारे भीतर एक जोश और जज्बा जागृत हो जाता है। हमारे देश की रक्षा करने के लिए सैनिक अपने प्राणों की आहुति हंसते हंसते दे देते हैं। ऐसे ही एक वीर सपूत दिल्ली में हैं जिन्होंने कारगिल युद्ध की लड़ाई लड़ी। लांस नायक सतवीर सिंह दिल्ली के ही मुखमेलपुर गांव में रहते हैं। वह करगिल युद्ध के दिल्ली से इकलौते जाबांज हैं। 19 साल बीत गए, पैर में आज भी पाकिस्तान की एक गोली फंसी हुई है, जिसकी वजह से चल फिर नहीं सकते। बैसाखी ही एक सहारा है। यह योद्धा करगिल की लड़ाई जीते, मगर हक के लिए सरकारी सिस्टम से लड़ते हुए हार गए।

वह कहते हैं, ’13 साल 11 महीने नौकरी की। मेडिकल ग्राउंड पर अनफिट करार दिया। दिल्ली का अकेला सिपाही था। सर्विस सेवा स्पेशल मेडल मिला। सरकार ने जमीन व उस पर पेट्रोल पंप देने का वादा किया। उसी दरम्यान एक बड़ी पार्टी के नेता की तरफ से संपर्क किया गया। ऑफर दिया कि पेट्रोल पंप उनके नाम कर दूं। मैंने इनकार किया तो सब कुछ छीन लिया गया। 19 साल से फाइलें पीएम, राष्ट्रपति, मंत्रालयों में घूम रही हैं। आज तक कोई नहीं मिला। कोई मदद नहीं मिली। सम्मान नहीं मिला। डिफेंस ने सम्मान बरकार रखा।’ मजबूरन अब उन्होंने जूस की दुकान खोली और अब खुद ही ग्राहकों के जूठे बर्तन धो रहे हैं।

सतवीर सिंह ने करीब 14 साल फौज में रहते हुए देश की सेवा की। देश के लिए लड़ते हुए लांस नायक सतबीर सिंह के पैर में दो गोलियां लगी थी।जिसमे से एक गोली अभी भी उनके पैर में ही फंसी हुई है ,जिसकी वजह से वह ठीक से चल फिर नहीं सकते और बैसाखी ही एक सहारा है, पर उनको अपाहिज पैर में फंसी हुई इस गोली ने नहीं बल्कि देश के सड़े गले सरकारी सिस्टम और भ्रष्ट  राजनीति ने कर दिया ,इन्होने देश के लिए करगिल की लड़ाई जीती , मगर अपने हक के लिए देश के सिस्टम से लड़ते हुए हार गए... ये देश के असली हीरो है।

Monday, July 6, 2020

भारत का वो सीक्रेट हथियार, जिसका नाम सुनते ही दुश्मन देश थर्रा जाते हैं

कल्पना करिए भारत के उपर हमला हो गया है. दुश्मन के लड़ाकू जहाज और मिसाइलें पूर्वी और पश्चिमी दोनों सीमाओं से हमले के लिए प्रस्थान कर रहे हैं. राजस्थान की सीमा पर टैंकों का स्क्वैड्रन हमले के लिए बढ़ रहा है. समुद्री सीमा से नौसैनिक जहाजों का जत्था आगे आ रहा है. तभी अचानक एक रोशनी सी चमकती है और दुश्मन के सभी टैंक, लड़ाकू विमान, नौसैनिक जहाज और मिसाइलें एक धमाके के साथ खुद ब खुद आग के गोले में बदलकर खाक हो जाते हैं. ये कोई कल्पना नहीं बल्कि वास्तविकता है और ये कमाल कर सकता है भारत का सीक्रेट हथियार 'काली' अर्थात किलो एंपीयर लीनियर इंजेक्टर(Kilo ampere linear injector).

 क्या है 'काली' की ताकत? 
'काली' भारत का एक महाशक्तिशाली रक्षक हथियार है. जो कि दुश्मन के किसी भी हमले को नाकाम कर सकता है. इसके सामने विशालकाय टैंक, अत्याधुनिक लड़ाकू विमान उन्नत मिसाइलें भी फेल हैं. ऐसा कोई भी आधुनिक हथियार जिसमें इलेक्ट्रोनिक चिप, सर्किट या फिर किसी और तरीके की वायरलेस तकनीक लगी हो, उसे 'काली' पल भर में नष्ट कर सकता है. मिसाइलों और लड़ाकू विमानों के अलावा ये ड्रोन जैसे चालकरहित सशस्त्र विमानों और यहां तक कि अंतरिक्ष में घूम रही सैटेलाइट को भी मार कर गिरा सकता है.


कैसे काम करता है 'काली'?
भारत का शक्तिशाली हथियार 'काली' इलेक्ट्रो मैग्नेटिक तरंगों(electro magnatic waves) का तूफान पैदा करने वाला यंत्र है. जो सेकंड्स के अंदर भारी मात्रा में तरंगों की बौछार करता है. जिससे ये अपने संपर्क में आने वाले किसी भी इलेक्ट्रोनिक उपकरण को ठप कर देते हैं. लड़ाकू विमानों, टैंकों, मिसाइलों, ड्रोन और सैटेलाइट्स में कई तरह के सर्किट और इलेक्ट्रोनिक चिप होते हैं. जो कि इलेक्ट्रो मैग्नेटिक तरंगों के प्रहार के कारण काम करना बंद कर देते हैं. जिसकी वजह से ये अत्याधुनिक मशीनें पल भर में कबाड़ का ढेर बन कर रह जाती हैं. जिसके बाद इनके अंदर मौजूद हथियारों में विस्फोट हो जाता है.

'काली' के अंदर छोटे-छोटे संयंत्रों के अंदर भारी मात्रा में ऊर्जा को संग्रहित की जा सकती है. जिन्हें चार्ज करने के बाद किसी भी वक्त एक झटके से अपने लक्ष्य के उपर फेंका जा सकता है. इसकी कार्यप्रणाली को आसानी से समझने के लिए घरेलू कैपेसिटर या कंडेन्सर तो गौर से देखिए. जिसमें उर्जा एकत्रित होती है. जिसे छूने से करंट का झटका लगता है. इसी तरह काली में भारी मात्रा में उर्जा संग्रहित करने वाले कैपिसिटर जैसे यंत्र लगे होते हैं. जिनमें एकत्र उर्जा दुश्मन के इलेक्ट्रोनिक उपकरणों को जाम करके उसे पंगु बना सकती है. 

कैसे तैयार किया गया 'काली'
'काली' के जनक भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर (बार्क) के पूर्व डायरेक्टर डॉ. आर. चिदंबरम थे. उन्होंने इसे तैयार करने की योजना साल 1985 में ही बनाई थी. लेकिन लंबी चौड़ी तैयारी करने के बाद साल 1989 में जाकर इसपर काम करना शुरु हो पाया.

इसपर पिछले तीन दशकों से लगातार काम चल रहा है. इस बीच इसके कई संस्करण तैयार किए गए हैं. सबसे पहले 'काली-80' विकसित किया गया जिसके बाद 'काली-200' फिर 'काली-5000' और अब 'काली-10000' विकसित किया जा चुका है. 'काली' के निर्माण की प्रक्रिया में BARC(भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर) और DRDO(रक्षा विज्ञान और अनुसंधान संस्थान) दोनों जुड़े हुए हैं.
'काली' के शुरुआती संस्करण में प्रति नैनो सेकेंड एक गीगाबाइट इलेक्ट्रो मैग्नेटिक तरंगों का प्रहार होता था. लेकिन आखिरी सूचना मिलने तक 'काली' के नवीनतम प्रारुप से 100 मिली सेकेंड में 40 गीगावाट तक उर्जा तरंगें निकलती हैं. जो कि दुश्मन के बड़े से बड़े और अत्याधुनिक हथियारों को पल भर में तबाह कर सकती हैं. 


भारत का सीक्रेट मिशन है 'काली' 
'काली' और उसकी मारक क्षमता के बारे में भारत सरकार ने आधिकारिक रुप से कोई बयान जारी नहीं किया है. अभी सिर्फ इसके बारे में बुनियादी जानकारियां ही बाहर आई हैं. भारत की रक्षा क्षमता के लिए यह प्रोजेक्ट इतना अहम है कि सरकार ने इसके बारे में संसद में जानकारी देने से इनकार कर दिया था. समाचार एजेन्सी पीटीआई से प्राप्त जानकारी के मुताबिक 14 जुलाई 2018 को लोकसभा में काली-5000 से संबंधित सवाल पूछा गया था कि 'क्या काली 5000 को देश के रक्षा विभाग में शामिल करने का कोई प्रस्ताव है, अगर हां तो उसके बारे में बताया जाए' लेकिन तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिक्कर ने इस बारे में राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए कोई भी जानकारी देने से इनकार कर दिया था.


 

परिवर्तन योगेश संस्थान की ओर से युवा संस्कार उपाधि अलंकरण 2022

  चन्दौली ब्यूरो / डीडीयू नगर, उत्तर प्रदेश पत्रकार परिषद द्वारा पूर्वांचल रत्न अलंकरण सम्मान समारोह 2022 का भव्य आयोजन नगर के केसरी नंदन उत...