Sunday, June 6, 2021

सच को सच कहने दो, सच को सच रहने दो


 देश में बहुतायत विचार हैं पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS)के खिलाफ इतनी मुखर विरोध की परिपाटी भारत में आखिर क्यों ?
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भारत सनातन विचार संस्कार संस्कृति का देश रहा लुटेरों ने इसे ना-ना प्रकार के तौर तरीकों ना -ना प्रकार के भेष भूषा में आकर ,रहकर लुटा ।
हमारी उदार समझ संस्कृति व्यवहार में उनका आकर्षण इतना रहा की वो लूट के बावजूद भी भारत से जा न सके । भारत के हर चीज में वो मोह फास में फसे ही रहे वो धन ,वैभव हो ,भौगोलिक वातावरण हो, प्राकृतिक परिवेश हो, ऐतिहासिक धरोहर हो, या यहा के जनमानस की सहजता उदारता और संस्कार संस्कृति --------
कुछ लोगों ने हमें मिटाने का प्रयास किया तो कुछ नें हमें उलझाने का . कुछ छलने का तो कुछ नें हमारे जैसा बनने का भी प्रयास किया ।
हम भारतीय समझतें भी रहे और उलझते भी रहे और उसमें से कुछ अपने मौलिक अस्तित्व को बचाने के लिए  यथासंभव लड़ते भी रहे पर  यह क्रम इतना लंबा चला की भारत लुटेरों को भी अतिथि समझने लगा और अपने संस्कार संस्कृति के मोह फास में पड़ उन्हें 'आतिथि देवों भव" के भाव से देखने लगा ।
 कहावत हैं चोर लुटेरे सब कुछ छोड़ दे तब भी वो हेरा फेरी नहीं छोड़ता और यही हुआ ।  भारत की उदार शान्तिप्रिय जनता लुटे गये भारतीय संसाधनों पर बैठे लुटेरों को भी राजा मानने लगी और खुद को उनका प्रजा ----
यह सब चाल चलन देख लुटेरे भी भावुक हो गए और मेरा भी ,मेरा भी का झूठ बोलने लगे और हम सब ठहरे अति उदार हम भी उनके स्वर में स्वर मिला कहने लगे ---
क्यों नहीं ,क्यों नहीं -------
फिर क्या था लुटेरे भी अपने दिखने लगे ।
           पर आंतरिक सचं तो हैं लुटेरों का कभी अपना विचार नहीं बदला
बस उनकी मजबूरी ये जरूर हो गईं की वो स्वीकार लिए की इतना बफादार जनसमाज और आस्थावान गुलाम और कही नहीं मिल सकता  ---- फिर हिस्से हिस्सेदारी धर्म की साझेदारी की खेती भारत के खेतों में भारतीय जन बल के श्रम व कार्य कौशल से शुरू हो गईं और देश के संस्कार संस्कृति अध्यात्म ज्ञान विज्ञान का बंदर बाट उनके बीच शुरू हो गया । जो कल लुटेरे थे वो आज भी लुटेरें हैं बस बदलाव हैं तो वो हैं कल वो लुटेरों के शक्ल में थे और आज हम शक्ल हो गए हैं ।
■------------लुटेरें चाहे कितने भी हम शक्ल हो  हम वतन
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हो उन्हें सह हिस्सेदार मानना ही गलत शायद यह विचार
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 रखने के कारण ही  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विरोध
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 करने का चलन बन गया  --------------
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आरएसएस बनांम अन्य •••••••••
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●आरएसएस जो कहती हैं करती हैं दीखती हैं सोचती हैं समझती और  होती हैं   ---
★पर हमारे विरोधी  ---कहते  कुछ हैं, सोचते कुछ हैं, होते कुछ हैं, दिखते कुछ हैं-- और चाहते कुछ हैं ---
●हम जहा सत्य को बचाना चाहते हैं ।
★वो झूठ को सजाना चाहते हैं ।
●हम अपनी संस्कार संस्कृति के छांव में रहना चाहते हैं ।
★वो बदलाव की आड़ में हमें हमारी अच्छाइयों से दूर कर देना चाहते हैं ।
●हमारा इतिहास आस्था विश्वास व चरित्र प्रधान हैं ।
★वो हमारे आस्था व विश्वास के खिलाफ चरित्रहीनता को आदर्श बताना चाहते हैं
●हम इस देवभूमि के उत्तराधिकारी हैं यह भूलना नहीं चाहते ।
★वो देवभूमि के लुटेरें इस आस्था से जुड़ना नहीं चाहते क्यों की उन्हें डर हैं की उनका लूट झूठ जगजाहिर होगा ।
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हम सिर्फ असहमत नहीं ---
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कुरीतियों को मिटाने नये नये आयाम को बढ़ाने का हम सब के  पास भी विकल्प खुला हैं  यह प्रमाणित करता हुआ  हमारे पास भूत, वर्तमान व लचर व उदार  भविष्य  हैं पर इसके बावजूद हमारा एक  हठ हैं
----सच को सचं रहने दो , सचं को सचं कहने दो ।
---------------------चन्द्र भूषण मिश्र "कौशिक"
                        संरक्षक /परिवर्तन योगेश परिवार

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