●••यही आज-------------राष्ट्र हित की राष्ट्रीय क्रांति हैं । । भारत माता की जय ।।
याद रहे ! भारत को कमजोर करने वाली समझ ,सोच, विचार, व्यवहार को भारत छोड़ो को विवश करने ' कहने से पहले सच्चे मन से समझ लो- राष्ट्र हित सर्वोपरि समझ की हमारी एकता,सजगता व व्यवहारिकता ही भारत को विश्वगुरु बना सकती हैं । और भारत में व्यापत भ्रष्टाचार ,दुराचार,अनाचार से भारतीयों को मुक्ति दिला सकती हैं । इसके लिए सिर्फ राष्ट्र सपूतों को पूजना ही नहीं ,सबको सच्चा राष्ट्र सपूत बनना भी होगा । धर्म जात ऊँचनीच के भेद भाव को अपने निज् मन से बाहर कर सिर्फ देश और सच्चे देशवाशियों के लिए लड़ना होगा ।
#स्मरण_रहे --जब जब भारत ऐसे इच्छा शक्ति से लड़ा हैं तो जरूर जीता हैं ।
■आज क्रांति के समग्र दृष्टिकोण से हम भारत व भारतीय आदिवासी समाज का जल जंगल जमीन यानि अपनी मातृभूमि से सहृदय प्रेम और इस प्रेम में समाहित राष्ट्रीय चिंता और चेतना संबध्य भारत की आजादी के संघर्ष में बलिदान त्याग तप व तपस्या पर हुयी आहुति को स्मरण करते हुए कहना चाह रहा हूँ की----
👍हम भारतीय आदिवासी अभिशप्त नहीं ,विश्व के सबसे सशक्त मानवीय चेतना हैं । आप आदिवासी का मतलब क्या समझते हैं. यह तो मैं नहीं जानता लेकिन मैं जो समझता हूँ । उसके अनुसार हम विश्व की कृतिम वातावरण में एक मौलिक मानवीय हस्ताक्षर के प्रतीक के रूप हैं ---मैं तो यही जानता और समझता रहा हूँ । वर्तमान परिवेश के अपने देश में यह कहा जा सकता हैं कि जंगली आदिवाशी ,ग्रामीण आदिवासी व शहरी आदिवाशी के खंड में तो नहीं कड़ीगत (चेन) में हम अलग अलग कुनबों व विचारों में फैल से गये हैं। जिससे हम एक हो कर भी खंड खंड भाव ,भावनाओं के प्रभाव में ऐसे जकड़ गये हैं कि राष्ट्र की श्रेष्ठा से खुद की श्रेष्ठता हमें ज्यादा प्यारी लगने लगी हैं । और ऐसे हालात में हमारे में अपने मौलिक समझ का बने रह पाना मुझे तो मिथ्या और एक अव्यवहारिक समझ ही लगता हैं । यही कारण हैं कि हम सब अपने संस्कार ,संस्कृति आकृति और प्रकृति के विपरीत जाने को तैयार हो आदिवाशी समझ को समझने की जगह उसे उपेक्षा का विषय कहना और समझाना शुरू कर दिये हैं ।
इस बदलाव ने ही तो हमारे अनुशासन और प्रशासन दोनों को कृतिम विदेशी मन माफितों के गुलांमी की दशा दिशा में जाने को ढकेल दिया ।और फिर क्या था --हम आदिवासी भी नहीं और भारतवाशी भी न रह सके ।
👍भारत छोड़ो आंदोलन की क्या अब जरुरत नहीं रही ?••••••धर्म की जय हो अधर्म का नाश हो से आजादी को जोड़ते हुए मैं जब भी न्याय और नीति की समझ की ओर देखता हूँ . तो मुझे लगता हैं ।अंग्रेजों की जाने के बाद भी भारत में अंग्रेजीयत बनी रह गई ।उसी तरह से जिस तरह से भारत राष्ट्र पिता के हाथों से निकल ऐसे व्यक्ति के हाथ में आ गई जो जन्म से भारतीय था ,पर तनं मन के विचारों से वो भारतीयता को जी सकने में बिलकुल सक्षम न था । परंतु दायित्व भारत से जुड़ा था इस लिए उन्होंने खुद को भारत के संस्कार और संस्कृति के अनुकूल करने के बजाय भारत और भारतीयता को बदल अंग्रेजी समझ के करीब कर दिया ताकि भारत आजाद भारत बन तो जाए पर भारतीयता को आजादी की समझ न हो सके । इसी का परिणाम हुआ की धर्म की जय की जगह--- धर्म विमुखता की जय को धर्म निरपेक्षता का नाम दे दिया गया । और हम सब नया भारत नई सोच के नाम पर उस ओर बढ़ा दिए गए जिस ओर आजाद भारत को कभी जाने की कोई जरूरत ही नहीं थी ।
●मेरे ख्याल से धर्म निरपेक्षता नहीं भारत की सबलता ,सुरक्षा और श्रेष्ठता की बात होनी चाहिए थी ।
जिस समय आजाद भारत की अनुभूति के साथ हमारे राजनीति को भारत और भारतीय जरुरत के अनुकूल चलना चाहिए था । दुर्भाग्यवश उस समय भारत की राजनीती को ही, अपने राजनैतिक जरूरतों के आधार पर भारत और भारतीयता को गढ़ने में लग या लगा दिया गया ।
परिणामतः जो भारत की मौलिक विचारधारा थी उसमें अपने स्वरुचि के स्वाद और अपनी जरूरतों के वाद भर दिए गए ।।
◆हम सब विकल्पहीन कभी नहीं थे ----
बाएं अगर समस्याएं थी तो दाहिने हमारे पास इसका समुचित समाधान भी था .लेकिन सिर्फ समस्याओं को दिखा कर व समाधान को छिपा कर हमें इस तरह से छला गया कि हमें छले जाने के बोध के बावजूद हमें छले जाने पर दुःख न हुआ ।
और हम छलाओं को स्वीकारने को ही बदलाव मानते गये ।
देश से जुड़ों और खुद को देश से जोड़ो ।
कहने की अभी जरुरत हैं ताकि भारत में भारत के संस्कार के साथ आपसी आत्मिक प्यार का पदार्पण हो सकें और न्याय राष्ट्र धर्म प्रिय बने और अधर्म अन्याय दंडनीय ।।
भृष्टाचार ,दुराचार,दलाली ,गद्दारी ,बेरोजगारी, गरीबी, शोषण, जातपात भेदभाव -- भारत छोड़ो !
यही आज की आजादी की लड़ाई हैं ।।
चन्द्र भूषण मिश्र "कौशिक"
संरक्षक परिवर्तन परिवार
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