Saturday, January 9, 2021

कोरोना महामारी में अभिभावक लाचार स्कूलों को चाहिए सिर्फ फीस और अपना व्यापार


 स्कूली बच्चों के अभिभावक और कान्वेंट विचार के निजी स्कूलों के प्रबंधक आमने-सामने और दर्शक बनी सरकार और सरकारी नीतियां  !------एक समीक्षा ◆
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●क्या सरकार अभिभावक को निराश और निजी स्कूलों को आक्रामक बना कर शिक्षा में व्याप्त भ्रष्टाचार को संरक्षित व संवर्धित कर रही है ?
यह सवाल जनता के प्रति सरकार की उदासीनता और निजी स्कूलों के अड़ियल रवैए को देखकर जनमानस के मन में आने लगा है. हम निजी विद्यालयों में अपने बच्चे को अपने आर्थिक मानक के आधार पर भेजते हैं। यानी जहां तक हम अपने को सक्षम पाते हैं ,वहां तक  बेहतर शिक्षा की संभावनाओं के चाह से हम अपने बच्चों के लिए स्कूलों का चयन करते हैं ।
 लेकिन आज कल  फीस में राहत की जो मांग हैं वो हमारी सक्षमता और अशक्षमता  का विषय हैं ही नहीं , बल्कि कोरोना  आपदा काल में अस्त व्यस्त आर्थिक तंत्रों के दुष्परिणाम पर राहत और समाधान को लेकर है ।
                                  जाने क्यों --यह सचं  समझने की जगह आज की राजनैतिक शक्तियां ,पक्ष ,विपक्ष सब के सब हम अभिभावकों की  हैसियत समझने और समझाने में लगी हुयी हैं ।
आज सरकार जनता की हैं या निजी स्कूलों के लिए यह अभिभावकों के मन की पीड़ा ही फीस आन्दोलन का कारण बना हैं । क्यों की जनमानस के मन में आदर्श सरकार के प्रति राय बनी हैं कि आपदा में व्यक्ति ,क्षेत्र ,वर्ग जैसे  मानक का कोई महत्व नहीं होता क्यों कि आपदा परिस्थित विशेष में क्षति और हानि की प्रतीक होती हैं. और इसमें मानवता हित की प्राथमिकता ही सबसे बड़ी सरकारी कर्तव्य की सरकार की प्राथमिकता होती हैं ।
               लेकिन व्यवहार में कोरोना आपदा में
【स्कूल बंद फीस जारी और शिथिल सरकार हमारी 】
जैसे हालात के बढ़ने और फीस की जगह लगान वसूले जाने की प्रवृति को बल मिलने से कई सवाल अभिभावकों के मन में आने लगे हैं जैसे --------
■ क्या सरकार और जनप्रतिनिधियों में अनैतिक धन उगाही की चाह प्रबल हो गई हैं . और ऐसे उपक्रम के हिस्सेदारों में इनकी सहभागिता और  बाहुल्यता हो गईं हैं । यानी शिक्षा सेवा के नाम पर कर की चोरी का एक सुरक्षित साधन के रूप में स्कूली शिक्षा को व्यापार बना कर शासन, प्रशासन इसका संरक्षण और जन हितों का भक्षण कर रहे हैं ।    
■क्या शिक्षा में मानवी परिणाम के व्यवहार में न आने पर भी विपक्ष का मौन रहना और अभिभावकों के हितों को नजरअंदाज कर अमानवीय सरकारी नीतियों के खिलाफ आवाज नहीं उठाना विपक्ष और पक्ष का मिल भ्रष्टाचारी तंत्रों से निज् लाभ का स्वार्थ सिद्धि का सचं जगजाहिर होने लगा हैं ।
■क्या अब मान लिया जाय की  सरकार जनसेवा और जनकल्याण के कार्य पालन की निगरानी की जगह  सिर्फ एक  दल बन गई हैं जो सिर्फ अपने लाभ हानि के मूल्यांकन पर ही विश्वास करती हैं ।
■क्या मानवीय जरूरतों और परिस्थितियों पर भी  अमानवीय हल के लिए ही सरकार हैं या फिर  हाथी के दाँत खाने और दिखाने के अलग अलग हैं ।
■क्या जनसेवा का कुर्ता  पहन लोग अब लूट के पायजामे को छिपाने की नीति से शिक्षा सेवा संस्थाओं को अपने संरक्षण में भ्रष्टाचार युक्त बने रहने के लिए फलने फूलने और  छिपने , छिपाने का सिर्फ नीति और नियत ढो रहे हैं ।
■क्या जनता के हित की जिम्मेदारी लेने वाले जनप्रतिनिधि सिर्फ व्यापार और व्यापारी बन कर ही जन समस्याओं को सुन और समझ रहे हैं ।
■क्या  न्यायपालिका ,कार्यपालिका सब के सब आर्थिक सबलता की आधीनता स्वीकार चिंतन करने लगे हैं ।
■क्या जन आन्दोलनों की समीक्षा की जगह उसकी उपेक्षा की परंपरा  इस लिए व्यवहार में प्रबल हो रही ताकि  जनता में  निर्बलता  और दुर्बलता बनी रहे और कृपा और दया की याचना से ऊपर उनकी समझ और अधिकार की स्थिति परिस्थिति न बन सके ।
■क्या अनैतिक अर्थ उगाही के लिए स्कूल एक नैतिक माध्यम की लोकप्रियता हासिल कर लिया हैं जिसके सहारे  सरकार के आँख में सेवा का चोला पहन सबसे अच्छे और सम्मानित रूप रेखा में धूल झोकने का सफल परीक्षण चक्र बेरोक टोक चल पड़ा हैं और इस रोड मैप में पक्ष विपक्ष एक बराबर हिस्सा पाने लगे हैं ।
■क्या स्कूल और चिकित्सा कहने को सिर्फ सेवा हैं लेकिन व्यवहार में लूट ,झूठ और अनैतिक कमाई का व्यापार बन गया हैं। जिसका जनसेवक बन ज्यादातर सबल लोग लाभ उठा रहे हैं और सरकार इस सचं को छिपाने में सहयोगी बन रही हैं ।
■ क्या भ्रष्टाचार से कमाए रूपये और मेहनतकश कमाई को एक  प्रकार के मानक से देखने का सरकारी नीति और नियत ही दोषपूर्ण चरित्र का पोषक बन बैठी हैं ।
                      #जनहित की जबाबदेही की उपेक्षा पर जनता में एकता का न होना  । दल की  दलदल में फसकर जनबल का विखर जाना ही भ्रष्टाचारी शक्तियों के लिए संजीवनी हैं ।  वर्ना जनता की  भावनाओं और  उनकी जरूरतों को व्यापार बना भारत का लोकतंत्र इस तरह से भ्रष्ट स्कूली नीतियों के सामने गुलाम बन खड़ा न होता अब तक सरकार भ्रष्ट स्कूली व्यवस्था के खिलाफ जनता के साथ खड़ी हो गई होती ।।
-------------चन्द्र भूषण मिश्र "कौशिक'

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