जो मध्यमवर्ग राष्ट्र और राष्ट्रवादी पथ पर चलने को सबसे ज्यादा जज्बा
रखता हैं वही राष्ट्रवादी सरकार के चाभुक से आज सबसे ज्यादा पीटा जा रहा
----
क्या प्रधानमंत्री मोदी जी मध्यम वर्ग को अपने
विकास मॉडल के तस्वीर में जबरनिया आगे बढ़ा देना चाहते हैं या फिर
मध्यमवर्ग की कैटगरी को समाप्त ही कर देना चाहते हैं यह सवाल अब मध्यम
वर्ग को सताने लगा हैं ?
**************
ऐसी स्थिति परिस्थिति में दो ही विकल्प होते हैं ---------
■ एक में मध्यमवर्ग आगे बढ़ जाये ।
■तो दूसरे में मध्यमवर्ग अति निम्न की दिशा में चला जाये
और मध्यम वर्ग का विकल्प ही समाप्त हो जाये ।
मैं यह तो नहीं कह सकता कि मोदी जी की कार्य प्रणाली में मध्यम वर्ग
विल्कुल सहभागी ही नहीं पर मैं यह भी नहीं मान सकता कि मध्यम वर्ग सिर्फ
सरकार सहयोगी व उनका अनुकरण करने वाली चरित्र की ही हो ।
♀अभी तक सरकार
के द्वारा किये गए बड़े फैसले में मध्यम वर्ग ही तो सबसे ज्यादा
#प्रभावितऔरप्रभावी हुआ हैं यह तो सरकार को समझना और मानना ही होगा ।
क्यों
की वर्तमान सरकार को बनाने और वर्तमान सरकार को बढ़ाने में मध्यम वर्ग की
भूमिका सरकार अगर नजरअंदाज करती हैं तो जनविश्वास के साथ यह एक बड़ा
विश्वासघात सा होगा ऐसा मुझे लगता हैं ।
धनवान वर्ग और कारपोरेट वर्ग तो
सत्ता के साथ हर समय गलबहियां बनाकर चलता ही रहा हैं इसमें कोई नई बात तो
नहीं ----बस पहले और आज में बस एक ही फर्क हैं कि पहले ओधोगिक घराने
राजनैतिक घरानों को सीधा लाभ पहुंचाते थे ।
पर अब वर्तमान सरकार में व्यक्तिगत कम दलगत ज्यादा सहयोग का चलन-प्रचलन में हो गया हैं ।
● अब सवाल हैं कि क्या मोदी सरकार सिर्फ चौकाने वाले फैसले और बदलाव से ही मध्यमवर्ग को साधने के भ्रम से भ्रामित हैं ?
••••••••••••••••तो
ऐसे में कहूँ तो यह सच हैं कि निम्नवर्ग रोटी ,कपड़ा ,मकान और छोटी छोटी
अपनी आवश्यकताओं पर सरकारी कृपा पात्रता पाकर खुश हो जाती हैं कुछ छोटी
मोटी आर्थिक ,सामाजिक,जातिगत सहयोग पर अपना मताधिकार दान दे या बेच देती
हैं जब की धनवान अपने धनबल से सरकार का चहेता बन उसके करीब आ जाता हैं
लेकिन ये दोनों वर्ग राष्ट्र निर्माण के दायित्व ले चलने का जबाबदेही का
कोई संकल्प पत्र नहीं भरते कोई स्थायी जिम्मेदारी नहीं लेते ।
सिर्फ अवसर और अवसरवादिता को जीते हैं और उसी के हित में चलने की पसंद पर विश्वास करते हैं ।
जब
की मध्यम वर्ग समाज निर्माण से लेकर राष्ट्रवाद तक का सबसे सक्रिय
सहयात्री बन राष्ट्र समाज और सरकार के हित में सबसे ज्यादा काम आते हैं ।
---------जाने
अनजाने में जाने क्यों सरकार मध्यमवर्ग की जरूरतों उनकी आकांक्षाओं उनकी
मांगों को नजरअंदाज कर रही या कहे मध्यमवर्ग को हताश व निराश कर रहीं !
◆◆◆कुछ
एक घुन पड़ जाने से गेहूं अनुपयोगी नहीं होता इतनी समझ तो सरकार को होनी ही
चाहिए यह आशा अभिलाषा मध्यमवर्ग की सरकार से हैं इसे सरकार को संज्ञान में
रखना चाहिए ।
मध्य तंत्र के बिना प्रारम्भ या अंत की परिकल्पना के एक मिथ्या नीति हैं ।
यह कहना चाहता हैं!--- मोदी सरकार से मध्यमवर्ग और यही सुनना आज देश की जरुरत भी हैं ---
क्यों
की प्राथमिक चिकित्सा व तैयारी के बिना बड़ी सर्जरी सरकार के साथ साथ किसी
और के जान जोखिम में डालने वाली समझ की कारण बन सकती हैं ।
यह हैं आज मध्यमवर्ग की गुहार ।।
-------------चन्द्र भूषण मिश्र "कौशिक"
Saturday, February 20, 2021
"मोदी सरकार से लगाव-----मध्यम वर्ग का भाग्य या दुर्भाग्य
Monday, February 1, 2021
बिना पढ़ाई फीस उगाही अब और नहीं अब और नहीं
■नो स्कूल नो फीस का नारा लगाना या बिना पढ़ाई फीस उगाही अब और नहीं अब और नहीं ।--- कहना कोई अपराध तो हैं नहीं ।
जिन संसाधनों का हमने या हमारे लोगों ने उपभोग किया ही नहीं आखिर उसका कोई भुगतान क्यों करें ?हर शिक्षा संस्था सेवा धर्मी हैं यह बिना व्यवहार के मानने को किसी को बाध्य करना गलत हैं । इस लिए उसकी हर मांग जायज हैं यह तुगलकी फरमान का क्या मतलब ?
ऐसे ही कुछ सवाल आज निजी स्कूल प्रबंधकों और अभिभावकों को आमने सामने ला खड़ा कर दिये हैं ।
बिना काम के दाम भारतीय संस्कार में वसूलने की प्रथा तो कहीं नहीं हैं । शायद अंग्रेज और अंग्रेजियत की चाल चलन का यह असर हैं कि अभी भी अंग्रेजी लगान की तरह भारत के सविधान के आँख में धूल झोंक कर स्कूल शिक्षा कह कर मनमांनी वसूली सिर्फ शिक्षा सेवा के नाम पर देश में जारी हैं । वो भी कोरोना महामारी के अंतरराष्ट्रीय स्थिति परिस्थित काल के समय में ।
आखिर यह कहने में संकोच कैसा की भारत के आंग्रेजियत व कान्वेंट समझ के निजी शिक्षा संस्थान के पालनहारो में उनके आचार विचार में निज् स्वार्थ की सिद्धि और अपनी अंग्रेजियत का दबदबा बना सेवा का चोला ओढ़ समाज में समाजसेवी बन खूब धन उगाही के सिवाय कोई और समझ आज की निजी स्कूलों सोच में नहीं हैं । यह कोरोना आपदा में बंद पड़े स्कूल और उनके द्वारा अभिभावकों से मांगे जा रहे फीस को देख कोई भी समझ सकता हैं ।
जिस प्रकार सिथिल पड़े अंगों में शून्यता आ जाती हैं उसी तरह शिक्षा के नाम पर अभिभावक विश्वासप्रद शिथिलता में थे और इसी शिथिलता की आड़ में शिक्षा जैसी मौलिक जरुरत को भी स्वार्थ के हवाले कर सरकारे सरकारी तंत्रों की शिक्षा के प्राण हरण कर निजी स्कूली शिक्षा को सबल दिखाने की भूल या छल करने लगे । जिसके कारण शिक्षा सेवा की आड़ में सामन्ती व्यवहार का फलना फूलना सरकारी निगरानी में जारी हो गया ।
#प्रस्तुत हैं जितनी पढ़ाई उतना ही फीस आंदोलन से जुड़े अभिभावक चन्द्रभूषण मिश्र कौशिक" जी से हुई वार्ता के कुछ_अंश -----
■ ?--अभिभावकों में स्कूली लूट को लेकर विश्वास और बहिष्कार में कोई अन्तःद्वन्द हैं क्या ?
◆बिलकुल नहीं ऐसा तो इस लिए लग रहा हैं क्यों की स्कूल और अभिभावकों के बीच सरकार ने एक कृतिम चश्मा जारी कर दिया हैं वो हैं ट्रस्ट ।इस लिए लोगों को लग रहा की स्कूली नीतियों का खिलाफत करने का मतलब सरकार का विरोध जब की यथार्थ यह हैं कि सरकार के संसाधनों के दुर्पयोग को रोकने का आंदोलन हो गया हैं शिक्षा आंदोलन ।
■?--सरकारी तंत्र और स्कूल मिले हैं । आपका यह कहना ठीक हैं क्या ---?
◆ विश्वास जिस भरोसे का है वो तो कही दिख ही नहीं रही बल्कि आज की भ्रष्टाचारी एकता जग जाहिर हैं ।सरकार और प्रशासन को अभिभावकों के साथ खड़ा होना चाहिए था पर वो सब निजी सामंती स्कूलों के छतरी के नीचे खड़े हो अभिभावकों के खिलाफ बयान और आदेश जारी कर रहे हैं । इसे देख क्या कहा जा सकता हैं ? यही तो आज अनैतिकता एक जुट हैं और नैतिकता में विखराव जो भारत में बढ़ते भ्रष्टाचार का मूल कारण भी हैं ।
■क्या शासन ,प्रशासन के नीति और नियत में खोट हैं यह कह कर आप उनकी मंशा पर सवाल उठा रहे हैं ?
◆जब नीति और नीयत दोनों एक दिशा में होते तो बात बनती बात विगड़ती बिलकुल नहीं ,पर आज का यकीनन सत्य यही हैं कि शासन ,प्रशासन उनके लिए काम कर रही हैं जो आम नागरिकों पर शासन करने में सरकार को बल दे रहे । जब की नीतिगत मांग और न्याय संगत नागरिक सिर्फ अपनी दुर्बलता का बोध लिए न्याय के लिए सिर्फ इधर उधर भटक रहे हैं ।
■क्या आप कहना चाहते हैं कि सरकार आपके संसाधनों का आपके ही खिलाफ इस्तेमाल की नीति को प्रोत्साहित करती हैं ?
◆ सरकार और नागरिकों के बीच यही तो हो रहा हैं तभी तो दलाल व अनैतिक तंत्र सरकार के करीबी बन जा रहे हैं और आम नागरिक ,अभिभावक, किसान,मजदूर सरकार के सामने दया के भीख मांगने वाले भिखारियों के भांति याचक ।
■न्यायपालिका पर आपका विश्वास किस हद तक कायम हैं ।
◆एक नगरपालिका के कुर्सी पर बैठा जब उस कुर्सी पर बैठाने वाले को अपना दास बना दे रहा हैं तो न्यायपालिका तो बहुत बड़ा तंत्र हैं जिस प्रकार लोकतंत्र से लोकहित गायब हैं उसी तरह से न्यायपालिका से जनहित का न्याय दूर हो गया हैं यह कहने की बात नहीं समझने की बात हैं । तारीख पर तारीख का पड़ना , मसला जहाँ का तहाँ अटका रहना इसी दिशा में संकेत करता हैं ।
■आप कह रहे बिना पढ़ाई फीस उगाही नहीं होना चाहिए और स्कूलों का कहना हैं हमारी जरूरत पूरी होनी चाहिए ?-----आखिर बात कैसे बनेगी !
◆अगर सबको शिक्षा का अधिकार न्यायसंगत हैं तो शिक्षा तंत्रों को न्यायसंगत नीति और नियत पर काम करना होगा ।जितनी पढ़ाई उतना फीस की समझ को स्वीकारना होगा पढ़ाई से ज्यादा बाहरी आडंबरों का बोलबाला ठीक नहीं ,न अभिभावकों से गलत लिया जाना चाहिए न स्कूल संचालन के लिए किसी शिक्षा अधिकारियों को कुछ गलत दिया जाना चाहिए । स्कूल और अभिभावक एक साथ हो जाएंगे तो स्कूली लूट और स्कूलों से लूट दोनों बंद हो सकता हैं ।
■क्या अभिभावक निजी स्कूलों के संसाधनों व सुविधाओं को नजरअंदाज कर उनका मूल्यांकन कर रहे हैं ?
◆निजी स्कूलों के संसाधनों के बदले ही महंगी शिक्षा फीस भुगतान की प्रथा आयी हैं । शिक्षा बेहतर तो सब जगह होनी चाहिए वो चाहे सरकारी स्कूल हो या निजी स्कूल।अगर ऐसा नहीं हो पा रहा तो यह भारत सरकार की नाकामी हैं सिर्फ जनता इसके लिए जिम्मेदार और दंड के भागी नहीं बननी चाहिए मेरा कहना यह हैं ।
■सरकार और निजी स्कूल पर अभी तक अभिभावकों के आंदोलन का कितना दबाव पड़ा हैं । इस पर आपकी क्या राय हैं ?
◆ राजनैतिक इच्छा शक्ति अपने लाभ के खिलाफ इतना जल्दी सुनेगी कम से कम मैं तो ऐसा नहीं मानता हूँ । क्यों की ट्रस्ट के आंगन में भ्रष्टों का बहुत बड़े पैमाने पर हिस्सेदारी हैं और इस हिस्सेदारी के रास्ते टैक्स चोरी से लेकर सामंती रसुकदारी की जड़े बहुत गहरी और घने रूप में फैली हैं । इसे नजरअंदाज कर किसी परिणाम की आशा ठीक नहीं हैं ।
■फिर तो यह मान लिया जाय की आप सब सिर्फ पत्थर पर सर मार रहे हैं कुछ होना जाना नहीं हैं ?
◆हम सब तो आस्था से पत्थर को पूज उसमें भी देवत्व की ऊर्जा का एहसास रखने वाले लोग हैं । अभी तो जनजागरण के लिए समर्पण हो रहा, आने वाले समय में इस हवन में बहुत कुछ स्वाहा होगा इस विश्वास से आंदोलन की ऊर्जा दिनों दिन जीत की ओर ही बढ़ ही रही हैं । इसे कोई नजरअंदाज करता हैं तो यह उसकी भूल हैं ।
■धीरे धीरे कोरोना महामारी काल पर टाल मटोल कर सरकार और स्कूल नये सत्र में आ गए अब तो बाते ख़त्म होती नजर आ रही हैं फिर आप सब की तरफ से आगे की रणनीति क्या होगी ?
◆कोई तूफान जब थमता हैं तभी इससे हुए नफा ,नुकसान का सही विश्लेषण होता हैं ।
अभी ही तो सही माने में अभिभावकों के अधिकार ,स्कूली अन्याय और सरकार का रवैया व पक्ष,विपक्ष का चरित्र सब जनता को समझ आने लगा हैं । अभिभावकों के अंदर का कई एक भ्रम अब ही तो टूटा हैं । अब जो सवाल सरकार और स्कूलों के समक्ष आयेगे वही सवाल हुकूमत और उसके अलमबरदारों को बिना कपड़ों के कर देगे ।और उनके पीछे खड़े सारे के सारे थैलीशाहों के चेहरे साफ साफ नजर आने लगेंगे ।
■अब यह सवाल हैं कि आप सब सरकार के व्यवहार से ज्यादा निराश हैं या स्कूलों के व्यवहार से ?
◆नीति सही दिशा में काम करें । जनता के पक्ष में होने वाले सत्याग्रह को राजनैतिक तंत्र गंभीरता से लें । यह चाहत हर आम जनमानस के मन में हैं और रहेगा । जिस चाहत से जनता सरकारों को चुनती हैं उस चाहत पर उदासीन सरकार जनता में निराशा देने के पात्र बनती हैं पर कहे तो लूट और झूठ के मामले में छोटे स्कूल मानवी हैं जब की बड़े बड़े स्कूल ज्यादातर ही अमानवीय हैं कोरोना काल में हुए इस बोध से अभिभावक चिंता में भी हैं और निराशा में भी । इसी पेंच ने सरकार और स्कूल के नीति और नीयत दोनों पर सवालिया निशान लगा दिया है। अब अभिभावक भरोसा करे भी तो कैसे करे । अब तो उन्हें लगने लगा हैं की वो तो विश्वास की आड़ में लगातार ठगे जाते रहे हैं । जिन नेताओं और पक्ष विपक्ष को वो अपना मानते रहे वो सब तो सामंती सोच और पैसों के बीच दंडवत की मुद्रा में बिछे पड़े हैं । पर एक बात कहना चाहूंगा ऐसे हालात ने अभिभावकों को आईना भी खूब दिखाया जिससे इस आंदोलन को न सिर्फ मजबूती मिली बल्कि कई मायनों में यह आंदोलन शिक्षा सुधारों में एक शिला लेख की भांति जनमानस के मन में अंकित भी हुआ हैं । जिसके कारण पहली बार अभिभावक स्कूलों से जबाबदेही और सवाल पूछने लगे है।
इस सवाल में उंगली स्कूल और सरकार दोनों पर उठी हैं दूसरी खास बात यह कि यह आंदोलन अभिभावकों द्वारा बिना नेता बिना बड़े नेर्तित्व के आम पीड़ित अभिभावकों ने अपने हिसाब से लड़ना शुरू किया हैं और अभी तक लड़ भी रहे हैं । अगर सब कुछ यूँ ही चलता रहा तो यह कहना शायद गलत न हो कि आज नहीं तो कल शिक्षा क्षेत्र के सेवा आड़ ले बाजारवादी समझ की ताकतों को मुँह की खानी ही पड़ेगी ।
■आगे आंदोलित अभिभावकों से आप कुछ कहना चाहेंगे --
◆मैं कहना चाहता हूँ की जो अभिभावक इस परिस्थिति विशेष लड़ाई को खामोश तमाशबीन की तरह यह सोच कर देख रहे कि यह उनकी बात नही बल्कि कुछ अशक्षम अभिभावकों का मामला है उन्हें इससे कुछ लेना देना नहीं तो वो गलत सोच रहें ,समझ रहे । न तो भ्रष्टाचार की कोई सीमा हैं न भ्रष्टाचारी का कोई इमान ही ।
आज हम लुटे जाएंगे तो कल आपका भी नंबर आएगा अगर यही संकुचित सोच और विखराव रहा तो हर शख्स इस स्कूली लूट का शिकार हो जायेगा और शिक्षा जैसी मौलिक जरूरत अमानवीय हो जायेगी ।।
■अंतर में आप कुछ अपनी बात जनता से सीधे कहना चाहेंगे ?
●मैं सामंती स्कूलों के अन्याय के खिलाफ अगर लड़ नहीं सकता तो संघर्ष करते करते मर तो सकता हूँ । यह मेरी कायरता होगी या मेरा सत्याग्रह यही समाज को तय करना हैं । आज अभिभावकों द्वारा भूख हड़ताल और कल आमरण अनशन भी होगा ।
सत्य जीते यह कोशिश हमारी तरफ से होगी अगर सत्य हारा तो शिक्षा की गुणवत्ता का पतन होगा और कुछ भी नहीं । -----चन्द्र भूषण मिश्र "कौशिक"】
जिन संसाधनों का हमने या हमारे लोगों ने उपभोग किया ही नहीं आखिर उसका कोई भुगतान क्यों करें ?हर शिक्षा संस्था सेवा धर्मी हैं यह बिना व्यवहार के मानने को किसी को बाध्य करना गलत हैं । इस लिए उसकी हर मांग जायज हैं यह तुगलकी फरमान का क्या मतलब ?
ऐसे ही कुछ सवाल आज निजी स्कूल प्रबंधकों और अभिभावकों को आमने सामने ला खड़ा कर दिये हैं ।
बिना काम के दाम भारतीय संस्कार में वसूलने की प्रथा तो कहीं नहीं हैं । शायद अंग्रेज और अंग्रेजियत की चाल चलन का यह असर हैं कि अभी भी अंग्रेजी लगान की तरह भारत के सविधान के आँख में धूल झोंक कर स्कूल शिक्षा कह कर मनमांनी वसूली सिर्फ शिक्षा सेवा के नाम पर देश में जारी हैं । वो भी कोरोना महामारी के अंतरराष्ट्रीय स्थिति परिस्थित काल के समय में ।
आखिर यह कहने में संकोच कैसा की भारत के आंग्रेजियत व कान्वेंट समझ के निजी शिक्षा संस्थान के पालनहारो में उनके आचार विचार में निज् स्वार्थ की सिद्धि और अपनी अंग्रेजियत का दबदबा बना सेवा का चोला ओढ़ समाज में समाजसेवी बन खूब धन उगाही के सिवाय कोई और समझ आज की निजी स्कूलों सोच में नहीं हैं । यह कोरोना आपदा में बंद पड़े स्कूल और उनके द्वारा अभिभावकों से मांगे जा रहे फीस को देख कोई भी समझ सकता हैं ।
जिस प्रकार सिथिल पड़े अंगों में शून्यता आ जाती हैं उसी तरह शिक्षा के नाम पर अभिभावक विश्वासप्रद शिथिलता में थे और इसी शिथिलता की आड़ में शिक्षा जैसी मौलिक जरुरत को भी स्वार्थ के हवाले कर सरकारे सरकारी तंत्रों की शिक्षा के प्राण हरण कर निजी स्कूली शिक्षा को सबल दिखाने की भूल या छल करने लगे । जिसके कारण शिक्षा सेवा की आड़ में सामन्ती व्यवहार का फलना फूलना सरकारी निगरानी में जारी हो गया ।
#प्रस्तुत हैं जितनी पढ़ाई उतना ही फीस आंदोलन से जुड़े अभिभावक चन्द्रभूषण मिश्र कौशिक" जी से हुई वार्ता के कुछ_अंश -----
■ ?--अभिभावकों में स्कूली लूट को लेकर विश्वास और बहिष्कार में कोई अन्तःद्वन्द हैं क्या ?
◆बिलकुल नहीं ऐसा तो इस लिए लग रहा हैं क्यों की स्कूल और अभिभावकों के बीच सरकार ने एक कृतिम चश्मा जारी कर दिया हैं वो हैं ट्रस्ट ।इस लिए लोगों को लग रहा की स्कूली नीतियों का खिलाफत करने का मतलब सरकार का विरोध जब की यथार्थ यह हैं कि सरकार के संसाधनों के दुर्पयोग को रोकने का आंदोलन हो गया हैं शिक्षा आंदोलन ।
■?--सरकारी तंत्र और स्कूल मिले हैं । आपका यह कहना ठीक हैं क्या ---?
◆ विश्वास जिस भरोसे का है वो तो कही दिख ही नहीं रही बल्कि आज की भ्रष्टाचारी एकता जग जाहिर हैं ।सरकार और प्रशासन को अभिभावकों के साथ खड़ा होना चाहिए था पर वो सब निजी सामंती स्कूलों के छतरी के नीचे खड़े हो अभिभावकों के खिलाफ बयान और आदेश जारी कर रहे हैं । इसे देख क्या कहा जा सकता हैं ? यही तो आज अनैतिकता एक जुट हैं और नैतिकता में विखराव जो भारत में बढ़ते भ्रष्टाचार का मूल कारण भी हैं ।
■क्या शासन ,प्रशासन के नीति और नियत में खोट हैं यह कह कर आप उनकी मंशा पर सवाल उठा रहे हैं ?
◆जब नीति और नीयत दोनों एक दिशा में होते तो बात बनती बात विगड़ती बिलकुल नहीं ,पर आज का यकीनन सत्य यही हैं कि शासन ,प्रशासन उनके लिए काम कर रही हैं जो आम नागरिकों पर शासन करने में सरकार को बल दे रहे । जब की नीतिगत मांग और न्याय संगत नागरिक सिर्फ अपनी दुर्बलता का बोध लिए न्याय के लिए सिर्फ इधर उधर भटक रहे हैं ।
■क्या आप कहना चाहते हैं कि सरकार आपके संसाधनों का आपके ही खिलाफ इस्तेमाल की नीति को प्रोत्साहित करती हैं ?
◆ सरकार और नागरिकों के बीच यही तो हो रहा हैं तभी तो दलाल व अनैतिक तंत्र सरकार के करीबी बन जा रहे हैं और आम नागरिक ,अभिभावक, किसान,मजदूर सरकार के सामने दया के भीख मांगने वाले भिखारियों के भांति याचक ।
■न्यायपालिका पर आपका विश्वास किस हद तक कायम हैं ।
◆एक नगरपालिका के कुर्सी पर बैठा जब उस कुर्सी पर बैठाने वाले को अपना दास बना दे रहा हैं तो न्यायपालिका तो बहुत बड़ा तंत्र हैं जिस प्रकार लोकतंत्र से लोकहित गायब हैं उसी तरह से न्यायपालिका से जनहित का न्याय दूर हो गया हैं यह कहने की बात नहीं समझने की बात हैं । तारीख पर तारीख का पड़ना , मसला जहाँ का तहाँ अटका रहना इसी दिशा में संकेत करता हैं ।
■आप कह रहे बिना पढ़ाई फीस उगाही नहीं होना चाहिए और स्कूलों का कहना हैं हमारी जरूरत पूरी होनी चाहिए ?-----आखिर बात कैसे बनेगी !
◆अगर सबको शिक्षा का अधिकार न्यायसंगत हैं तो शिक्षा तंत्रों को न्यायसंगत नीति और नियत पर काम करना होगा ।जितनी पढ़ाई उतना फीस की समझ को स्वीकारना होगा पढ़ाई से ज्यादा बाहरी आडंबरों का बोलबाला ठीक नहीं ,न अभिभावकों से गलत लिया जाना चाहिए न स्कूल संचालन के लिए किसी शिक्षा अधिकारियों को कुछ गलत दिया जाना चाहिए । स्कूल और अभिभावक एक साथ हो जाएंगे तो स्कूली लूट और स्कूलों से लूट दोनों बंद हो सकता हैं ।
■क्या अभिभावक निजी स्कूलों के संसाधनों व सुविधाओं को नजरअंदाज कर उनका मूल्यांकन कर रहे हैं ?
◆निजी स्कूलों के संसाधनों के बदले ही महंगी शिक्षा फीस भुगतान की प्रथा आयी हैं । शिक्षा बेहतर तो सब जगह होनी चाहिए वो चाहे सरकारी स्कूल हो या निजी स्कूल।अगर ऐसा नहीं हो पा रहा तो यह भारत सरकार की नाकामी हैं सिर्फ जनता इसके लिए जिम्मेदार और दंड के भागी नहीं बननी चाहिए मेरा कहना यह हैं ।
■सरकार और निजी स्कूल पर अभी तक अभिभावकों के आंदोलन का कितना दबाव पड़ा हैं । इस पर आपकी क्या राय हैं ?
◆ राजनैतिक इच्छा शक्ति अपने लाभ के खिलाफ इतना जल्दी सुनेगी कम से कम मैं तो ऐसा नहीं मानता हूँ । क्यों की ट्रस्ट के आंगन में भ्रष्टों का बहुत बड़े पैमाने पर हिस्सेदारी हैं और इस हिस्सेदारी के रास्ते टैक्स चोरी से लेकर सामंती रसुकदारी की जड़े बहुत गहरी और घने रूप में फैली हैं । इसे नजरअंदाज कर किसी परिणाम की आशा ठीक नहीं हैं ।
■फिर तो यह मान लिया जाय की आप सब सिर्फ पत्थर पर सर मार रहे हैं कुछ होना जाना नहीं हैं ?
◆हम सब तो आस्था से पत्थर को पूज उसमें भी देवत्व की ऊर्जा का एहसास रखने वाले लोग हैं । अभी तो जनजागरण के लिए समर्पण हो रहा, आने वाले समय में इस हवन में बहुत कुछ स्वाहा होगा इस विश्वास से आंदोलन की ऊर्जा दिनों दिन जीत की ओर ही बढ़ ही रही हैं । इसे कोई नजरअंदाज करता हैं तो यह उसकी भूल हैं ।
■धीरे धीरे कोरोना महामारी काल पर टाल मटोल कर सरकार और स्कूल नये सत्र में आ गए अब तो बाते ख़त्म होती नजर आ रही हैं फिर आप सब की तरफ से आगे की रणनीति क्या होगी ?
◆कोई तूफान जब थमता हैं तभी इससे हुए नफा ,नुकसान का सही विश्लेषण होता हैं ।
अभी ही तो सही माने में अभिभावकों के अधिकार ,स्कूली अन्याय और सरकार का रवैया व पक्ष,विपक्ष का चरित्र सब जनता को समझ आने लगा हैं । अभिभावकों के अंदर का कई एक भ्रम अब ही तो टूटा हैं । अब जो सवाल सरकार और स्कूलों के समक्ष आयेगे वही सवाल हुकूमत और उसके अलमबरदारों को बिना कपड़ों के कर देगे ।और उनके पीछे खड़े सारे के सारे थैलीशाहों के चेहरे साफ साफ नजर आने लगेंगे ।
■अब यह सवाल हैं कि आप सब सरकार के व्यवहार से ज्यादा निराश हैं या स्कूलों के व्यवहार से ?
◆नीति सही दिशा में काम करें । जनता के पक्ष में होने वाले सत्याग्रह को राजनैतिक तंत्र गंभीरता से लें । यह चाहत हर आम जनमानस के मन में हैं और रहेगा । जिस चाहत से जनता सरकारों को चुनती हैं उस चाहत पर उदासीन सरकार जनता में निराशा देने के पात्र बनती हैं पर कहे तो लूट और झूठ के मामले में छोटे स्कूल मानवी हैं जब की बड़े बड़े स्कूल ज्यादातर ही अमानवीय हैं कोरोना काल में हुए इस बोध से अभिभावक चिंता में भी हैं और निराशा में भी । इसी पेंच ने सरकार और स्कूल के नीति और नीयत दोनों पर सवालिया निशान लगा दिया है। अब अभिभावक भरोसा करे भी तो कैसे करे । अब तो उन्हें लगने लगा हैं की वो तो विश्वास की आड़ में लगातार ठगे जाते रहे हैं । जिन नेताओं और पक्ष विपक्ष को वो अपना मानते रहे वो सब तो सामंती सोच और पैसों के बीच दंडवत की मुद्रा में बिछे पड़े हैं । पर एक बात कहना चाहूंगा ऐसे हालात ने अभिभावकों को आईना भी खूब दिखाया जिससे इस आंदोलन को न सिर्फ मजबूती मिली बल्कि कई मायनों में यह आंदोलन शिक्षा सुधारों में एक शिला लेख की भांति जनमानस के मन में अंकित भी हुआ हैं । जिसके कारण पहली बार अभिभावक स्कूलों से जबाबदेही और सवाल पूछने लगे है।
इस सवाल में उंगली स्कूल और सरकार दोनों पर उठी हैं दूसरी खास बात यह कि यह आंदोलन अभिभावकों द्वारा बिना नेता बिना बड़े नेर्तित्व के आम पीड़ित अभिभावकों ने अपने हिसाब से लड़ना शुरू किया हैं और अभी तक लड़ भी रहे हैं । अगर सब कुछ यूँ ही चलता रहा तो यह कहना शायद गलत न हो कि आज नहीं तो कल शिक्षा क्षेत्र के सेवा आड़ ले बाजारवादी समझ की ताकतों को मुँह की खानी ही पड़ेगी ।
■आगे आंदोलित अभिभावकों से आप कुछ कहना चाहेंगे --
◆मैं कहना चाहता हूँ की जो अभिभावक इस परिस्थिति विशेष लड़ाई को खामोश तमाशबीन की तरह यह सोच कर देख रहे कि यह उनकी बात नही बल्कि कुछ अशक्षम अभिभावकों का मामला है उन्हें इससे कुछ लेना देना नहीं तो वो गलत सोच रहें ,समझ रहे । न तो भ्रष्टाचार की कोई सीमा हैं न भ्रष्टाचारी का कोई इमान ही ।
आज हम लुटे जाएंगे तो कल आपका भी नंबर आएगा अगर यही संकुचित सोच और विखराव रहा तो हर शख्स इस स्कूली लूट का शिकार हो जायेगा और शिक्षा जैसी मौलिक जरूरत अमानवीय हो जायेगी ।।
■अंतर में आप कुछ अपनी बात जनता से सीधे कहना चाहेंगे ?
●मैं सामंती स्कूलों के अन्याय के खिलाफ अगर लड़ नहीं सकता तो संघर्ष करते करते मर तो सकता हूँ । यह मेरी कायरता होगी या मेरा सत्याग्रह यही समाज को तय करना हैं । आज अभिभावकों द्वारा भूख हड़ताल और कल आमरण अनशन भी होगा ।
सत्य जीते यह कोशिश हमारी तरफ से होगी अगर सत्य हारा तो शिक्षा की गुणवत्ता का पतन होगा और कुछ भी नहीं । -----चन्द्र भूषण मिश्र "कौशिक"】
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