मेरा यह कहना और गाय माता व राष्ट्रभक्ति वाली समझ के साथ प्राचीन संस्कृति से गुरुकुल तक का शैक्षणिक शिक्षा का पक्षकारी करना आपको एक पिछड़ापन सा सोच समझ लग सकता हैं । पर मेरे लिए तो यही हमारा गौरव हैं ,और यही हमारी भारतीयता की आबाद ,आजाद व आदर्श संस्कृति भी हैं ।
यह मैं बेवजह नहीं कह रहा हूँ :---बल्कि इस लिए कह रहा हूँ की आप यह मानकर मत बैठिए की गुलांमी की शिक्षा पद्ध्यति में आज का शिक्षित कभी न कभी जाग कर भारत के संस्कार और संस्कृति का पक्षधर हो अपने आप ही जाग जायेगा ।
ऐसा कुछ नहीं होने वाला क्यों की अगर कोई जागना भी चाहेगा तो यह गुलाम शिक्षा नीति उसे जागने नही देगी ।
शून्य हो चुकी चेतना को समझाना और विश्वास दिलाना तब तो और भी कठिन हो जायेगा जब बचे खुचों से भी यह स्मृति गायब हो जायेगी की हमारी सभ्यता स्वयं में प्राचीन और सबसे विकसित एक सर्वश्रेष्ठ सभ्यता हैं ।
जब तक शिक्षा में आर्थिक समझ और उपभोगवादिता से अंग्रेजियत समझ को बिना जाने सुने,समझे हमें उसे श्रेष्ठ मानने को शिक्षा की सार्थकता समझाया जाता रहेगा तब तक भारतीय सभ्यता ,संस्कार ,संस्कृति ,प्रकृति पर हमारा विश्वास कैसे संभव होगा मैं तो नहीं समझ पाता । अगर कभी मेरी बात गहराई से समझने की इच्छा हो तो इस प्रकार से समझिएगा । भारत के आजाद इतिहास में गांधी जी और नेहरू जी से योग्य और बौद्धिक प्रभाव का कोई अब तक खड़ा नहीं हो सका या कह लें अब तक किसी को खड़ा नही होने दिया गया । इसलिए गांधी जी और नेहरू जी जैसे महान लोगों को यहा उदाहरण स्वरूप समझा मैं अपनी अगली बात कहना चाहूंगा ।
विदित हो की गांधी जी और नेहरू जी मूलतः भारतीय थे भारत की आजादी के लिए संघर्षरत चेहरा थे शिक्षित और उच्च विदेशी शिक्षा से शुशोभित बौद्धिक सामाजिक ,राजनैतिक जनमान्य में एक प्रमुख हस्ताक्षर भी थे फिर भी वो भारत के महानता को समझने में असमर्थ थे और भारतीयता के सनातनीय सभ्यता पद्ध्यति को स्वीकारने मानने पर असहज भी ।
उनकी राष्ट्र भक्ति और हमारी राष्ट्र भक्ति में न चाहते हुए एक भेद बना रहा आखिर ऐसा क्यों ?
क्या उनकी आजादी और हमारी आजादी में ही भेद था या वो जिस भारत की खोज में थे वो आजाद भारत नाम से मिलने वाली आजादी में हम सब को गुलांमी की बू आती रही । इस आपसी विरोध और असहमति के पीछे कुछ तो कारण होगा !
इन सब सवालों को लेकर गांधी जी नेहरू जी व इनके समतुल्यओं को दोषी मानना बिलकुल ही सही नहीं क्यों की मेरा मानना हैं गांधी जी और नेहरू जी की शिक्षा भले ही अलग तकनीक की रही हो पर उनकी नियत और मंशा तो कभी गलत नही होगी !
शायद वो कान्वेंट की समझ से शिक्षित थे -----और हम गुरुकुल से ----।
।।वो भारत एक खोज थे तो हम भारत एक बोध ।।
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अब आप कंहेगे की यह कान्वेंट शब्द कौन सी नई बला हैं जो भारत और भारतीयता को प्रभावित करती हैं ।
तो आइये ! जानते हैं यह कान्वेंट क्या होता हैं ?
ध्यान से देखे व समझे तो कान्वेंट स्कूलों के मकड़जाल में फसाया गया भारत , ---आजादी के बाद भी इस मकड़जाल से नहीं निकल सका ।
कान्वेंट हमारा शब्द भी नहीं न तो इससे जुडी हुयी हमारे पास कोई भाव भावना ही हैं । हमारी संस्कृति हमारा संस्कार भी इससे मिलता जुलता नही फिर भी हम इस प्रकार की शिक्षा का आज भी गुलाम् बने हुए हैं ।
जानते हैं क्यों ? क्यों की हममें इन साजिशों का कभी बोध ही नहीं रहा या कह ले जिन्हें बोध कराना चाहिए था उनको इस प्रकार की चेतना पर कभी विश्वास ही नही रहा वो कभी इसके लिए सजग ही नही रहे ।
बिना जाने समझे कान्वेंट शब्द पर गर्व करना हमारी पहली गलती रही तो अपने संस्कार और संस्कृति को भूल आजादी के बाद भी दूसरे के पीछे भागते लोगो के पीछे चलना हमारी दूसरी गलती रही ।
इसको समझने के लिए हैं मैं समझाना चाहूंगा कि ----
👍क्या हैं यह कान्वेंट!:-----
ब्रिटेन में एक कानून था जिसमें स्त्री व पुरुष लिव इन रिलेशनशिप के नाम पर बिना किसी वैवाहिक संबंध के पति पत्नी के रिश्तों में रह सकते थे ऐसे में शाररिक संबंधों का बनना सौभाविक था ,इस प्रक्रिया में अनचाहे संतानों का पैदा होना भी व्यवहारिक था अब वो पैदा बच्चें क्या हों ? तो ऐसी स्थिति में लोग ऐसे बच्चों को चर्च में छोड़ने लगे । अब ब्रिटेन के सामने एक समस्या हुयी की इन बच्चों का क्या किया जाय ? तब वहा की सरकार ने कान्वेंट केंद्र खोले जहा इन नाजायज बच्चो को अनाथता से बचाया जा सके । इन बच्चों को कृतिम देख रेख के लिए वहा फादर ,मदर व सिस्टर की नियुक्ति की गई । काहे की ---उन बच्चों के पास प्रत्यक्ष न तो वास्तविक पिता थे न वास्तविक माँ न कोई बहन --------#तब #जा #कर #बना #इन #नाजायज #बच्चो #के #लिए #जायज #कान्वेंट #केंद्र ।
1609 में पहला कान्वेंट स्कूल इंग्लैण्ड के एक चर्च में खुला जब की भारत में पहला कॉन्वेंट स्कूल कलकत्ता में 1842 में खोला गया तब तो हम सब गुलाम थे । पर आज गांधी नेहरू के आजाद भारत में हम कॉन्वेंट प्रेमी हैं या कह ले लाखों की संख्या में कॉन्वेंट स्कूलों को स्वीकारें हुए हैं : इतना ही नहीं इन विचारों के रोकथाम करने की जगह इनके लिए अपने देश में उच्च शिक्षा तक की व्यवस्था अनैतिक विचारों को प्रोत्साहित करते हुए हमने ही की हैं ।
पिता के अनुशासन संस्कार से विहीन माता के पालन संस्कार से हीन सामाजिक संस्कृति से वंचित राष्ट्र और राष्ट्रवाद से अनभिज्ञ ये कॉन्वेंट से निकले बच्चे हमें हमारे ज्ञान ,विज्ञान ,संस्कार ,संस्कृति के आदर्श केंद्र गुरुकुल के लोगो को कुछ भी कह सकते हैं । क्यों की इनके पास रिश्तों का कोई इतिहास नहीं हैं कोई बोध ज्ञान नहीं हैं ।
मैकाले ने अपने पिता को एक चिट्ठी लिखी थी जिसमें उसने कुछ ऐसा ही लिखा था :--इन कान्वेंट स्कूलों से ऐसे बच्चे निकलेंगे जो देखने में तो भारतीय होंगे(मतलब गांधी ,नेहरू होंगे ) लेकिन दिमाग से अंग्रेज होंगे ।इन्हें अपने देश के बारे में कुछ पता नहीं होगा ।इनको अपने संस्कृति के बारे में कुछ पता नहीं होगा ।इनको अपने परंपराओं के बारे में कुछ पता नहीं होगा ।
इनको अपने मुहावरे नहीं मालूम होंगे ,जब ये पीढ़ी आगे होंगी उस समय देश से अंग्रेज भले ही चले जाएं पर इस देश पर से अंग्रेजियत कभी नहीं जाएगी । यानि तब तक ये फसल हमारी गुलांमी को मान्य व स्वीकार हमारे हो चुके होंगे । अपने संस्कार और संस्कृति को उजाड़ फेकने को हमारे लिए तैयार हो चुके होंगे ।
यह सब जानकर समझकर अब नहीं तो कब जागेगा भारत आप भी पूछिये -- अपनी आत्मा से एक बार यह सवाल -
विश्व गुरु भारत क्यों अब भी हैं गुलाम् ?
भारत माता की जय ।
चन्द्र भूषण मिश्र "कौशिक"
यह मैं बेवजह नहीं कह रहा हूँ :---बल्कि इस लिए कह रहा हूँ की आप यह मानकर मत बैठिए की गुलांमी की शिक्षा पद्ध्यति में आज का शिक्षित कभी न कभी जाग कर भारत के संस्कार और संस्कृति का पक्षधर हो अपने आप ही जाग जायेगा ।
ऐसा कुछ नहीं होने वाला क्यों की अगर कोई जागना भी चाहेगा तो यह गुलाम शिक्षा नीति उसे जागने नही देगी ।
शून्य हो चुकी चेतना को समझाना और विश्वास दिलाना तब तो और भी कठिन हो जायेगा जब बचे खुचों से भी यह स्मृति गायब हो जायेगी की हमारी सभ्यता स्वयं में प्राचीन और सबसे विकसित एक सर्वश्रेष्ठ सभ्यता हैं ।
जब तक शिक्षा में आर्थिक समझ और उपभोगवादिता से अंग्रेजियत समझ को बिना जाने सुने,समझे हमें उसे श्रेष्ठ मानने को शिक्षा की सार्थकता समझाया जाता रहेगा तब तक भारतीय सभ्यता ,संस्कार ,संस्कृति ,प्रकृति पर हमारा विश्वास कैसे संभव होगा मैं तो नहीं समझ पाता । अगर कभी मेरी बात गहराई से समझने की इच्छा हो तो इस प्रकार से समझिएगा । भारत के आजाद इतिहास में गांधी जी और नेहरू जी से योग्य और बौद्धिक प्रभाव का कोई अब तक खड़ा नहीं हो सका या कह लें अब तक किसी को खड़ा नही होने दिया गया । इसलिए गांधी जी और नेहरू जी जैसे महान लोगों को यहा उदाहरण स्वरूप समझा मैं अपनी अगली बात कहना चाहूंगा ।
विदित हो की गांधी जी और नेहरू जी मूलतः भारतीय थे भारत की आजादी के लिए संघर्षरत चेहरा थे शिक्षित और उच्च विदेशी शिक्षा से शुशोभित बौद्धिक सामाजिक ,राजनैतिक जनमान्य में एक प्रमुख हस्ताक्षर भी थे फिर भी वो भारत के महानता को समझने में असमर्थ थे और भारतीयता के सनातनीय सभ्यता पद्ध्यति को स्वीकारने मानने पर असहज भी ।
उनकी राष्ट्र भक्ति और हमारी राष्ट्र भक्ति में न चाहते हुए एक भेद बना रहा आखिर ऐसा क्यों ?
क्या उनकी आजादी और हमारी आजादी में ही भेद था या वो जिस भारत की खोज में थे वो आजाद भारत नाम से मिलने वाली आजादी में हम सब को गुलांमी की बू आती रही । इस आपसी विरोध और असहमति के पीछे कुछ तो कारण होगा !
इन सब सवालों को लेकर गांधी जी नेहरू जी व इनके समतुल्यओं को दोषी मानना बिलकुल ही सही नहीं क्यों की मेरा मानना हैं गांधी जी और नेहरू जी की शिक्षा भले ही अलग तकनीक की रही हो पर उनकी नियत और मंशा तो कभी गलत नही होगी !
शायद वो कान्वेंट की समझ से शिक्षित थे -----और हम गुरुकुल से ----।
।।वो भारत एक खोज थे तो हम भारत एक बोध ।।
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अब आप कंहेगे की यह कान्वेंट शब्द कौन सी नई बला हैं जो भारत और भारतीयता को प्रभावित करती हैं ।
तो आइये ! जानते हैं यह कान्वेंट क्या होता हैं ?
ध्यान से देखे व समझे तो कान्वेंट स्कूलों के मकड़जाल में फसाया गया भारत , ---आजादी के बाद भी इस मकड़जाल से नहीं निकल सका ।
कान्वेंट हमारा शब्द भी नहीं न तो इससे जुडी हुयी हमारे पास कोई भाव भावना ही हैं । हमारी संस्कृति हमारा संस्कार भी इससे मिलता जुलता नही फिर भी हम इस प्रकार की शिक्षा का आज भी गुलाम् बने हुए हैं ।
जानते हैं क्यों ? क्यों की हममें इन साजिशों का कभी बोध ही नहीं रहा या कह ले जिन्हें बोध कराना चाहिए था उनको इस प्रकार की चेतना पर कभी विश्वास ही नही रहा वो कभी इसके लिए सजग ही नही रहे ।
बिना जाने समझे कान्वेंट शब्द पर गर्व करना हमारी पहली गलती रही तो अपने संस्कार और संस्कृति को भूल आजादी के बाद भी दूसरे के पीछे भागते लोगो के पीछे चलना हमारी दूसरी गलती रही ।
इसको समझने के लिए हैं मैं समझाना चाहूंगा कि ----
👍क्या हैं यह कान्वेंट!:-----
ब्रिटेन में एक कानून था जिसमें स्त्री व पुरुष लिव इन रिलेशनशिप के नाम पर बिना किसी वैवाहिक संबंध के पति पत्नी के रिश्तों में रह सकते थे ऐसे में शाररिक संबंधों का बनना सौभाविक था ,इस प्रक्रिया में अनचाहे संतानों का पैदा होना भी व्यवहारिक था अब वो पैदा बच्चें क्या हों ? तो ऐसी स्थिति में लोग ऐसे बच्चों को चर्च में छोड़ने लगे । अब ब्रिटेन के सामने एक समस्या हुयी की इन बच्चों का क्या किया जाय ? तब वहा की सरकार ने कान्वेंट केंद्र खोले जहा इन नाजायज बच्चो को अनाथता से बचाया जा सके । इन बच्चों को कृतिम देख रेख के लिए वहा फादर ,मदर व सिस्टर की नियुक्ति की गई । काहे की ---उन बच्चों के पास प्रत्यक्ष न तो वास्तविक पिता थे न वास्तविक माँ न कोई बहन --------#तब #जा #कर #बना #इन #नाजायज #बच्चो #के #लिए #जायज #कान्वेंट #केंद्र ।
1609 में पहला कान्वेंट स्कूल इंग्लैण्ड के एक चर्च में खुला जब की भारत में पहला कॉन्वेंट स्कूल कलकत्ता में 1842 में खोला गया तब तो हम सब गुलाम थे । पर आज गांधी नेहरू के आजाद भारत में हम कॉन्वेंट प्रेमी हैं या कह ले लाखों की संख्या में कॉन्वेंट स्कूलों को स्वीकारें हुए हैं : इतना ही नहीं इन विचारों के रोकथाम करने की जगह इनके लिए अपने देश में उच्च शिक्षा तक की व्यवस्था अनैतिक विचारों को प्रोत्साहित करते हुए हमने ही की हैं ।
पिता के अनुशासन संस्कार से विहीन माता के पालन संस्कार से हीन सामाजिक संस्कृति से वंचित राष्ट्र और राष्ट्रवाद से अनभिज्ञ ये कॉन्वेंट से निकले बच्चे हमें हमारे ज्ञान ,विज्ञान ,संस्कार ,संस्कृति के आदर्श केंद्र गुरुकुल के लोगो को कुछ भी कह सकते हैं । क्यों की इनके पास रिश्तों का कोई इतिहास नहीं हैं कोई बोध ज्ञान नहीं हैं ।
मैकाले ने अपने पिता को एक चिट्ठी लिखी थी जिसमें उसने कुछ ऐसा ही लिखा था :--इन कान्वेंट स्कूलों से ऐसे बच्चे निकलेंगे जो देखने में तो भारतीय होंगे(मतलब गांधी ,नेहरू होंगे ) लेकिन दिमाग से अंग्रेज होंगे ।इन्हें अपने देश के बारे में कुछ पता नहीं होगा ।इनको अपने संस्कृति के बारे में कुछ पता नहीं होगा ।इनको अपने परंपराओं के बारे में कुछ पता नहीं होगा ।
इनको अपने मुहावरे नहीं मालूम होंगे ,जब ये पीढ़ी आगे होंगी उस समय देश से अंग्रेज भले ही चले जाएं पर इस देश पर से अंग्रेजियत कभी नहीं जाएगी । यानि तब तक ये फसल हमारी गुलांमी को मान्य व स्वीकार हमारे हो चुके होंगे । अपने संस्कार और संस्कृति को उजाड़ फेकने को हमारे लिए तैयार हो चुके होंगे ।
यह सब जानकर समझकर अब नहीं तो कब जागेगा भारत आप भी पूछिये -- अपनी आत्मा से एक बार यह सवाल -
विश्व गुरु भारत क्यों अब भी हैं गुलाम् ?
भारत माता की जय ।
चन्द्र भूषण मिश्र "कौशिक"

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