Sunday, June 7, 2020

क्या वास्तव में डर का माहौल है…क्या हिंदुत्व बड़ी निर्दयी चीज है ?

जिस हिंदुत्व का रोना रोकर पाकिस्तान से लेकर भारत तक ये वाममार्गी इसे खतरनाक जताने की कोशिश करते हैं उसका न तो दहशतगर्दी का अतीत है, न वर्तमान। फिर भी वही है खतरा। सवाल तो ये उठना चाहिए कि अगर इस्लाम पाकिस्तान सहित कितने ही दूसरे देशों का आधिकारिक धर्म हो सकता है और बहुत से देशों का राष्ट्रीय धर्म ईसाई धर्म है, तो हिंदुत्व/हिंदू भारतीय जीवनशैली/धर्म क्यों नहीं हो सकती/सकता ?

‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ की विशुद्ध संगीतमयता के साथ छद्म मानवाधिकार, उदारता, सेक्युलरिज्म आदि थीम के गीत गाए जाते हैं। इनका सुर एक इसलिए है क्योंकि इन सबको, चाहे वो पाकिस्तान हो या हमारे देश की सेवाभावी पार्टियाँ, इन्हें एक ही चीज से खतरा है और वो है हिंदुत्व।

ये तो उल्टा मुस्लिम देशों से उत्पीड़ित होकर आए हिन्दुओं को भी भारत में शरण देने का विरोध कर रहे हैं। फिर हिंदू किस देश में जाएगा? CAA के विरोध में ये लोग सड़कों पर ऐसे जम गए जैसे इस सड़क के संवैधानिक बैरिकेड्स हों। इस विरोध का सीधा सपाट मतलब यही है कि पाकिस्तान ने तुम्हें निकाल दिया, हिन्दुस्तान में हम तुम्हें रहने नहीं देंगे।

जिसे देखो वही हमें बिन माँगी सीख देने आ जाता है। अतिथि बनकर दूसरों के घर में लूट मचाने वाले अंग्रेज हमें कहते रहे कि हम असभ्य हैं, इसलिए वो हमें सभ्यता सिखाने आए हैं और हम में से बहुत से मान भी गए। जिस भारत ने दुनिया को विकसित हड़प्पा सभ्यता दी, उस पर हड़पने की सभ्यता थोंप दी गई और उस पर भी तुर्रा ये कि हम पिछड़े और वो सभ्यता के ब्रह्मा, विष्णु, महेश।

इस भारत धरा पर अब एक पाखंड खंडिनी ध्वजा राजनैतिक और सामाजिक क्षेत्र में भी गाड़ने की जरूरत है, ताकि इन दोहरे मानदंडों के पाखंड को सोचने पर मजबूर किया जा सके। ‘कंटकेनैव कंटकम्’ मतलब ये कि काँटा, काँटे से ही निकलता है, कॉटन से नहीं। इन कुतर्की लोगों को इन्हीं की भाषा में जवाब देना होगा। ये तभी संभव है जब भारत का नागरिक जागरूक और न्यायशील बनेगा।

ऋषि दयानंद ने मनुष्य की परिभाषा बताते हुए लिखा है, “मनुष्य उसी को कहना जो मननशील होकर अपने समान औरों के सुख-दुःख और हानि-लाभ को समझे। अन्यायकारी बलवान से कभी न डरे और धर्मात्मा निर्बल से भी डरता रहे।” इसलिए मनुष्य बनें और बिना डरे अपनी अभिव्यक्ति की आजादी का उपयोग करें। हमारी स्वाभाविक उदारता, अतिथि सत्कार और सहिष्णुता का मानव मूल्यों से रहित स्वार्थी ताकतों ने हमेशा गलत फायदा उठाया है। हमें ये सुनिश्चित करना है कि अब ऐसा न हो।

हो सकता है कि कुछ युवाओं को इस जागरूकता अभियान में शामिल होना पिछड़ापन लगे, क्योंकि ज्यादातर पढ़े-लिखे युवा ही इस वामपंथी मायाजाल में जकड़े हुए हैं। लेकिन हमें ये भी याद रखना चाहिए कि बदलाव के मोड़ पर ये संशय एक आम बात है, जिसमें व्यक्ति का निर्णय ही उसे सही या गलत साबित करता है।

क्या आपको भी लगता कि डर का माहौल है… क्योंकि हिंदुत्व बड़ी निर्दयी चीज है, इसका मतलब इससे ज्यादा लचक तो आतंकवाद में है।

योगेश तरेहन -

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